रक्षाबंधन

रक्षाबंधन एक प्रमुख हिन्दू त्यौहार है जो प्रतिवर्ष श्रावण मास की पूर्णिमा को मनाया जाता है. भारत में इसे कहीं कहीं श्रावणी भी कहते हैं. रक्षाबंधन आग्रह, संकल्प और वचनबद्धता का त्यौहार है. बहनें भाईयों को राखी बांधती हैं और भाई उनकी रक्षा का संकल्प लेते हैं. दोनों के मध्य उपहारों का आदान प्रदान होता है.
माताओं बहनों द्वारा सैनिकों, शासकों और गुरुजनों को भी राखी बांधने की परंपरा है जिसमें यही निहितार्थ है.

बहनें इस दिन व्रत रखती हैं और तभी कुछ खाती पीती हैं जब वे अपने भाई को राखी बांध लेती हैं. अपनों को रिश्तों और आग्रहों में बांधे रखने का बहुत ही पावन त्यौहार है रक्षाबंधन. यह व्यक्ति को उसके कर्तव्य की याद भी दिलाता है.

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राखी का त्यौहार कब शुरू हुआ यह कोई नहीं जानता. लेकिन भविष्य पुराण में वर्णन मिलता है कि देव और दानवों में जब युद्ध शुरू हुआ तो दानव हावी होते नज़र आने लगे तब भगवान इन्द्र घबरा कर गुरु बृहस्पति के पास पहुंचे. वहां बैठी इन्द्र की पत्नी इंद्राणी सब सुन रही थी उन्होंने रेशम का धागा मन्त्रों की शक्ति से पवित्र करके अपने पति के हाथ पर बांध दिया संयोग से वह श्रावण पूर्णिमा का दिन था. लोगों का विश्वास है कि इन्द्र इस लड़ाई में इसी धागे की मन्त्र शक्ति से ही विजयी हुए थे. उसी दिन से श्रावण पूर्णिमा के दिन यह धागा बांधने की प्रथा चली आ रही है. यह धागा धन, शक्ति, हर्ष और विजय देने में पूरी तरह समर्थ माना जाता है.
इस वर्ष यह पर्व 18 अगस्त को मनाया जा रहा है.

नाग पंचमी 2016

नाग पंचमी हिन्दुओं का एक प्रमुख त्यौहार है.

हिन्दू पंचांग के अनुसार श्रावण मास की शुक्ल पंचमी को नाग पंचमी के रुप में मनाया जाता है. इस दिन नागों और सर्पों को देवता मान उनकी पूजा की जाती है. नाग पंचमी के ही दिन गांवों कस्बों में मेले लगते हैं कुश्तियों और खेलकूद की प्रतियोगिताओं का आयोजन होता है. इस दिन पशुओं को नदी तालाब आदि पर ले जाकर नहलाया धुलाया जाता है और उन्हें सजाया संवारा जाता है.

हमारी संस्कृति में पशु पक्षी, वृक्ष वनस्पति, नदी तालाब, चांद तारे सबके साथ आत्मीय संबंध जोड़ने का प्रयत्न किया गया है. हमारे यहां गाय की पूजा होती है. बहनें कोकिला व्रत करती हैं, कोयल के दर्शन हो अथवा उसका स्वर कान पर पड़े तब ही भोजन करती हैं. वृषभोत्सव के दिन बैल का पूजन किया जाता है. वट सावित्री व्रत में बरगद की पूजा होती है. परन्तु नाग पंचमी जैसे दिन नाग का पूजन जब हम करते हैं तो संस्कृति की विशिष्टता पराकाष्ठा पर पहुंच जाती है.

नाग को देव के रूप में स्वीकार करने में हिन्दुओं के हृदय की विशालता का दर्शन होता है.
भारत देश कृषिप्रधान देश है सांप खेतों का रक्षण करता है इसलिए उसे क्षेत्रपाल कहते हैं. चूहे और कीट आदि फसलों को नुक्सान पहुंचाने वाले तत्वों का नाश कर सांप खेतों को हरा भरा रखते हैं.
सांप हिन्दुओं के प्रधान देवता महादेव का आभूषण भी है इसलिए सम्मान का पात्र है. श्रावण मास वर्षाकाल है. वर्षाकाल में बिलों में पानी भर जाने के कारण सांप अधिक मात्रा में यहां वहां दृष्टिगोचर होते हैं. ऐसे में नागपंचमी का पर्व यह सन्देश देता है की सर्प आदर का पात्र है उसे नुक्सान ना पहुंचाया जाए.

नाग पंचमी को लोग घर में दीवार को गेरू से पोत कर उस पर नाग की आकृति बनाकर उसका पूजन करते हैं. घर के मुख्यद्वार के दोनों तरफ भी पंचमुखी नाग के चित्र उकेरे जाते हैं जो की उनके रक्षक होने का सूचक है.
कुछ लोग वनों में जाकर सांप की बांबियों पर दूध, चावल और सुगन्ध आदि अर्पित कर उनका पूजन करते हैं. इस वर्ष नाग पंचमी का पर्व 7 अगस्त को है.

गुरु पूर्णिमा 2016

आषाढ़ मास की पूर्णिमा को गुरु पूर्णिमा कहते हैं. इस दिन अपने गुरु की पूजा का विधान है.

गुरु पूर्णिमा वर्षा ऋतु के आरम्भ में आती है और इस दिन से चार महीने तक परिव्राजक साधु-सन्त एक ही स्थान पर रहकर भक्तों में ज्ञान वितरित करते हैं. ये चार महीने चौमासा कहलाते हैं और आवागमन के लिए अनुकूल नहीं होते. मौसम भी अच्छा होता है न अधिक गर्मी और न अधिक सर्दी. इसलिए अध्ययन के लिए यह उपयुक्त समय है. जैसे सूर्य के ताप से तप्त भूमि को वर्षा से शीतलता एवं फसल पैदा करने की शक्ति मिलती है, वैसे ही गुरु-चरणों में उपस्थित साधकों को ज्ञान, शान्ति, भक्ति और योग शक्ति प्राप्त करने की शक्ति मिलती है.

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यह दिन महाभारत के रचयिता कृष्ण द्वैपायन व्यास का जन्मदिन भी है. वे संस्कृत के प्रकांड विद्वान थे और उन्होंने चारों वेदों का संकलन किया था. इस कारण उनका एक नाम वेद व्यास है. उन्हें आदिगुरु कहा जाता है और उनके सम्मान में गुरु पूर्णिमा को व्यास पूर्णिमा नाम से भी जाना जाता है. भक्तिकाल के संत घीसादास का भी जन्म इसी दिन हुआ था वे कबीरदास जी के शिष्य थे.
शास्त्रों में ‘गु’ का अर्थ अंधकार या मूल अज्ञान और ‘रु’ का अर्थ दूर करने वाला किया गया है. गुरु को गुरु इसलिए कहा जाता है क्योंकि वह अज्ञान तिमिर का ज्ञान के प्रकाश से नाश कर देते हैं अर्थात अंधकार को हटाकर प्रकाश की ओर ले जाने वाले को ‘गुरु’ कहा जाता है. गुरु तथा देवता में समानता के लिए एक श्लोक में कहा गया है कि जैसी भक्ति की आवश्यकता देवता के लिए होती है वैसी ही गुरु के लिए भी. सद्गुरु की कृपा से ईश्वर का साक्षात्कार भी संभव है. गुरु की कृपा के अभाव में कुछ भी संभव नहीं है.
भारत वर्ष में गुरू पूर्णिमा का पर्व बड़ी श्रद्धा व धूमधाम से मनाया जाता है. प्राचीन काल में जब विद्यार्थी गुरु के आश्रम में निःशुल्क शिक्षा ग्रहण करता था तो इसी दिन श्रद्धा भाव से प्रेरित होकर अपने गुरु का पूजन करके उन्हें अपनी शक्ति सामर्थ्यानुसार दक्षिणा देकर कृत कृत्य होता था. पारंपरिक रूप से शिक्षा देने वाले विद्यालयों में, संगीत और कला के विद्यार्थियों में आज भी यह दिन गुरू को सम्मानित करने का होता है. मंदिरों में पूजा होती है, पवित्र नदियों में स्नान होते हैं, जगह जगह भंडारे होते हैं और मेले लगते हैं.
इस वर्ष यह पर्व 19 जुलाई को है.

मांगलिक दोष

विवाह के लिए कुंडली मिलान में सर्वप्रथम जो चीज देखी जाती है वह है मांगलिक दोष. ज्योतिषीय मान्यता है की मांगलिक का विवाह मांगलिक से ही होना चाहिए अन्यथा वैवाहिक जीवन कठिन हो जाता है अथवा पति पत्नी दोनों में से जो मांगलिक नहीं है उसे मृत्युतुल्य कष्ट संभव है.
जन्म कुंडली में जब मंगल प्रथम, द्वितीय, चतुर्थ, सप्तम, अष्टम अथवा द्वादश भाव में होता है तब व्यक्ति मांगलिक दोष का शिकार हो जाता है. जैसा की विदित है की मंगल चतुर्थ, सप्तम और अष्टम दृष्टि रखता है. उपरोक्त वर्णित मांगलिक स्थितियों में मंगल अपनी स्थिति और दृष्टि द्वारा सप्तम और अष्टम भावों को प्रभावित करता है.
सप्तम भाव पति या पत्नी और अष्टम भाव यौन सुख का प्रतिनिधित्व करता है. मंगल का स्वभाव है की वह जिस भाव में बैठता है अथवा जिन भावों पर दृष्टि डालता है उन्हें उत्तप्त कर देता है यानि उनके गुण दोषों में वृद्धि कर देता है. मांगलिक दोष की स्थिति में मंगल सप्तम जो की विपरीत लिंगी भाव है और अष्टम जो की कामचेष्टा और यौन क्षमता भाव है में भारी वृद्धि कर देता है. मांगलिक दोष वाला व्यक्ति सामान्य व्यक्ति के मुकाबले अधिक कामुक और कामचेष्टा संपन्न हो सकता है. अब चूंकि व्यक्ति समाज में रहता है और समाज यौन उच्छृंखलता की इजाजत नहीं देता इसीलिये इसे दोष रूप में निरुपित किया गया है.
इसीलिये कहा गया है की मांगलिक के साथ मांगलिक का विवाह हो ताकि गाड़ी के दोनों पहिए एक समान हों.
कई बार कहा जाता है की वर वधु में से एक मांगलिक हो और दूसरे के उसी भाव में यदि शनि, राहु अथवा केतु बैठे हों तो यह योग नष्ट हो जाता है. लेकिन इसके पीछे का तर्क समझ में नहीं आता की आखिर किस आधार पर ऐसा कहा गया है.

व्यक्ति तीन प्रकार से मांगलिक दोष से ग्रस्त होता है – पहला लग्न से, दूसरा जन्मस्थ चंद्र से और तीसरा जन्मस्थ शुक्र से. इनमे शुक्र वाली अवस्था सबसे उग्र और चंद्र वाली सबसे हल्की मानी जाती है. यदि व्यक्ति तीनों ही स्थितियों में मांगलिक हो तो वह प्रबल मांगलिक माना जायेगा.

मांगलिक दोष की शांति के लिए परंपरागत रूप से कुंभ विवाह, सावित्री पूजन और मंगल गौरी वट पूजन प्रचलित पूजाएं हैं.

निर्जला एकादशी 2016

सनातन व्रतों और त्यौहारों में एकादशी व्रत महत्वपूर्ण स्थान रखता है. प्रत्येक वर्ष 24 एकादशियां होती हैं. जब अधिक मास या मल मास आता है तब इनकी संख्या बढ़कर 26 हो जाती है. ज्येष्ठ मास की शुक्ल पक्ष एकादशी को निर्जला एकादशी कहते है, इस व्रत मे पानी तक पीना वर्जित है इसीलिये यह निर्जला एकादशी कहलाती है.
इस व्रत को पांडव एकादशी या भीमसेनी एकादशी भी कहते हैं. पौराणिक मान्यता है की भूख पर नियंत्रण ना रख पाने वाले भीमसेन ने महर्षि व्यास के मार्गदर्शन अनुसार इस व्रत को रख पुण्य पाया था.
निर्जला एकादशी भगवान विष्णु की आराधना का पर्व है. इस दिन कलश, घड़ा, खरबूज, तरबूज, ककड़ी, शरबत, पंखा, छतरी, हलके सूती वस्त्र आदि वस्तुओं के दान का विधान है.
निर्जला एकादशी आत्म संयम का व्रत है. निर्जल रहकर दान पुण्य करते हुए ‘ॐ नमो भगवते वासुदेवाय’ का जप करना इस व्रत का विधान है. यह व्रत सभी व्रतों में श्रेष्ठ और पाप नाशक माना गया है. कहा गया है की इसे करने से समस्त एकादशियों का फल मनुष्य को प्राप्त हो जाता है.
इस वर्ष यह व्रत 16 जून को पड़ रहा है.

अणु और ऋणु

यह वह ज्योतिषीय अवस्थाएं हैं जिनके द्वारा मानव मन का संयोजन और विघटन औसत रूप में परिभाषित किया जा सकता है.
कालपुरुष की प्रथम राशि मेष अणु कहलाती है. इसका स्वामी मंगल है, यहां से मानव जीवन आरंभ होता है.

यूं तो कुंडली के प्रथम भाव का नैसर्गिक कारक सूर्य है जो की आत्मा का द्योतक है लेकिन कालपुरुष की प्रथम अभिव्यक्ति मंगल है. इसलिए स्पष्ट ही कहा जा सकता है आत्मा रुपी सूर्य की सांसारिक अभिव्यक्ति मंगल है.

मेष संयोजन और अभियान राशि है. इसे भूमि से अतिशय प्रेम है और बलवती होने पर प्रचुरता से अचल संपत्ति का निर्माण करती है. स्वभाव से यह क्षत्रिय है. मानवीय अहम, समस्त भौतिक अभियान, मारकाट, जमींदारी, लालसा और लोलुपता इसी का अधिकार क्षेत्र हैं. देवताओं के सेनापति भगवान कार्तिकेय इस राशि के अधिदेवता माने गए हैं. मेष का रंग चमकता लाल है.

इस राशि के साथ एक दुर्भावना भी जुड़ी है और वह है इसका विपरीत लिंगीय संबंध, इस मामले में यह दुर्भाग्यशाली राशि है. क्योंकि ऋणु राशि तुला इसके सप्तम भाव का प्रतिनिधित्व करती है.

ऋणु द्वारा वह संयोजन विघटित होता दिखता है जो अणु द्वारा संयोजित हुआ था. इसकी प्रतिनिधि राशि तुला और स्वामी शुक्र है.

हालांकि विघटन के संकेत पूर्व राशि कन्या से ही मिलने लगते हैं जो की आश्रितों के लिए निकम्मी राशि है. कन्या राशि अपने किसी भी उत्तरदाई को सुखद आश्वासन नहीं देती. इससे उम्मीद बांधना दुखों को निमंत्रण देता है.

तुला राशि सांसारिक अर्थों में सर्वाधिक दुर्भाग्यपूर्ण राशि है. मौज मारते दिखते हुए भी इसके जातक दुखों की सूली पर टंगे होते हैं. इनके जीवन से संघर्ष और तनाव मानो कभी विदा ही नहीं होते. जीवन में कभी भी ऐसा दिन नहीं आता जिसे यह सुखद कह आनंद मना सकें.

इसका कारण है मेष के अणु द्वारा संयोजित मन के तुला के ऋणु द्वारा विघटन की प्रक्रिया का आरंभ. मेष से कन्या तक संयोजन और तुला से मीन तक विघटन की गाथा है ज्योतिष.
जो बना है उसे मिटना भी है, यही जीवन है.

बलकटी स्त्रियां होती हैं दुर्भाग्यशाली

अनुभव में पाया गया है की लड़कों जैसे छोटे बाल रखने वाली स्त्रियां दुखी रहती हैं.

वे भले ही उच्च पदस्थ अथवा धनी हों उनके जीवन में सुख नहीं होता. खासतौर पर पति सुख या विपरीत लिंगी सुख. ऐसी स्त्रियों को पुरुषों के प्यार और सहानुभूति की तलाश में भटकते देखा जा सकता है. यदि वे विवाहित हैं तो पति से नहीं बनती और अलगाव की स्थिति बन जाती है और अधिकांश मामलों में पति से संबंध विच्छेद हो भी जाता है.

इसका कारण ज्योतिष में छिपा है. कालपुरुष कुंडली का सप्तम भाव शुक्र का भाव है. यहां शुक्र की मूलत्रिकोण राशि तुला विराजमान है. सप्तम भाव सौंदर्य और कला का भाव है, साथ ही यह विपरीत लिंगी और जीवनसाथी का भी प्रतिनिधित्व करता है.

शुक्र सौंदर्य, भोग विलास और प्रसन्नता का कारक ग्रह है. लंबे और सुंदर केश स्त्रियों का आधारभूत सौंदर्य हैं, इनके बाद ही सौंदर्य की अन्य उपमाओं का नंबर आता है. जब स्त्री द्वारा अपने केशों को कटवा कर छोटा कर लिया जाता है तो शुक्र बुरी तरह पीड़ित हो जाता है और अशुभ परिणाम देने लगता है.

हिन्दू समाज में किसी की मृत्योपरांत पारिवारिक सदस्यों का मुंडन और किसी सन्यासी परंपरा के अनुसरण द्वारा पुरुषों का गंजा रहना भी इसी सत्य को प्रतिपादित करता है. यह भी शुक्र को निर्बल करने की प्रक्रिया है.

शनि शिंगणापुर स्त्रियों द्वारा तैलार्पण निषेध के कारण

स्त्रियों द्वारा शनि शिंगणापुर में शनिदेव को तैलार्पण निषेध के पीछे गहरा राज छिपा है जो स्त्रियों के ही हित में है.

सभी सनातन मान्यताएं अपने में गहन अर्थ लिए हैं भले ही आज उनके अर्थ विस्मृत हो गए हों और यह परंपरा भी इससे अछूती नहीं है.

शनि पाप ग्रह और ब्रह्माण्डीय न्यायाधीश है. शनि वैराग्य का कारक है. इससे प्रभावित व्यक्ति सांसारिक मोह से विमुक्त हो वैराग्य धारण करता है. इसकी दृष्टि अधो है जिसका अर्थ है की यह अपनी प्रचण्ड वैराग्यात्मक ऊर्जा को सतत पृथ्वी में निसृत करता रहता है.

परमात्मा की नवग्रह शक्ति वितरण व्यवस्था में शनि का मुख्य कार्य जीव को उसके कर्मों का फल प्रदान कर निर्मल करना है. मन के संयोजक मंगल के विपरीत यह मन को विखंडित करने की प्रक्रिया का कारक है.

शनि वायु का कारक और लिंग में नपुंसक है. वायु का प्रभाव वैचारिक भटकाव की आशंका उत्पन्न करता है.

शनि तैलार्पण शनि से उत्सर्जित हो रही वैराग्यात्मक ऊर्जा का बृहस्पति (तेल) द्वारा शमन है. पुरुषों को अनुमति है की वे अपना कुछ बृहस्पति अंश (धन एवं ज्ञान) इस प्रक्रिया हेतु व्यय कर सकते हैं.

लेकिन सनातन व्यवस्था स्त्रियों को इसकी अनुमति कदापि नहीं देती. स्त्रियों की प्रकृति पृथ्वी के समान ग्राहीय है और उन पर जन्म की महत् जिम्मेदारी है. उनके लिए वैराग्य की अपेक्षा भक्ति पर जोर दिया गया है.

भगवान श्रीकृष्ण द्वारा भी स्त्रियों के लिए संन्यास की बजाय भक्ति धारा निर्मित करने के प्रयास हुए.

सनातन दर्शन स्त्रियों को बृहस्पति अंश व्यय की बिलकुल अनुमति नहीं देता क्योंकि बृहस्पति स्त्रियों की कुंडली में पति, संतान (विशेषतया पुत्र), विनम्रता और बुजुर्गों के सम्मान का कारक है. शनि तैलार्पण से उनके पति और संतान को भय हो सकता है, साथ ही उनके स्वभाव का आधारभूत गुण विनम्रता उदंडता में परिवर्तित हो सकता है जो की परिवार और समाज के बिखराव का कारण होगा.

शंभल

हिन्दू और बौद्ध मान्यताओं में शंभल एक पवित्र स्थान है.

विष्णु पुराण के अनुसार दशम अवतार शंभल में जन्म लेगा. ऐसे ही बौद्धों के एक ग्रंथ कालचक्र तंत्र में कहा गया है की शंभल में मैत्रेय नाम से बुद्ध का अवतार होगा जो मलेच्छों का नाश करेगा.

इसे एशिया में कहीं छिपा माना गया है लेकिन कहां किसी को नहीं पता. कोई इसे हिमालय में तो कोई चीन में स्थित मानता है. रूस से भारत आकर बस गये महान चित्रकार निकोलाई रोरिक शंभल को दुर्गम हिमालय क्षेत्रों में जीवन भर खोजते रहे पर असफल रहे.
कल्कि पुराण में दशम अवतार कल्कि की माता सुमति (सद्बुद्धि), पिता विष्णुयश (पालन तत्व) और जन्मस्थान शंभल (पवित्र भूमि) बताया गया है. कल्कि की दो पत्नियां पद्मा (कमल विराजित) और रमा (संहारिणी शक्ति) हैं. कल्कि पुराणानुसार बाल्यवस्था में कल्कि का विवाह त्रिकुटा नामक कन्या से भी हुआ था लेकिन त्रिकुटा कभी कल्कि के साथ नहीं रहीं. पौराणिक मान्यता अनुसार माता वैष्णोदेवी ही त्रिकुटा हैं.

आश्चर्यजनक रूप से कल्कि अवतार के बारे में अनेक भविष्यवाणियां करने वाले त्रिकालज्ञ संत मावजी महाराज ‘क्षेत्र साबला, पुरी पाटन ग्राम’ का उद्घोष करते हैं. यह साबला और कुछ नहीं शंभल का ही अपभ्रंश है. ईसवी सन 745 में राजा वनराज चावड़ा ने पाटन की स्थापना की.
महाभारत काल में यह प्रदेश अनर्त कहलाता था जो की प्रसिद्द योद्धा सात्यकि और कृतवर्मा का घर था. यह दोनों योद्धा और अन्य अनर्त वीर पांडवों और कौरवों की तरफ से महाभारत युद्ध में लड़े थे. अनर्त गुजरात के काठियावाड़ का उत्तरी इलाका पाटन ही है.
प्राचीन पाटन का ह्रदय स्थल है वाडनगर जिसका इतिहास आज से 4500 वर्ष पीछे तक जाता है. इस स्थान की ऐतिहासिकता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है की वर्तमान में यह शहर एक एक टीले नुमा संरचना पर बसा हुआ है जो की और कुछ नहीं एक के ऊपर एक बसी सभ्यताएं हैं.
वेदों में वर्णित महान ऋषि याज्ञवल्कय जो की शास्त्रार्थ में अजेय थे का घर चमत्कारपुर भी यही क्षेत्र है. बृहदारण्यक उपनिषद में ऋषि याज्ञवल्कय का विस्तार से वर्णन है.
सांतवीं सदी में चीन से भारत आये चीनी यात्री ह्युन्सांग का आनंदपुर भी वाडनगर ही है, आज इस बात के ठोस पुरातात्विक साक्ष्य मौजूद हैं.
हड़प्पा, सनातन, रोमन, बौद्ध, और जैन संस्कृति को स्वयं में समेटे अतीत में मंदिरों का शहर वाडनगर इतना पवित्र माना जाता था की धर्म, कला और संस्कृति के पिपासुओं के आकर्षण का केंद्र था…

कुयोग या दुर्योग

कुयोग या दुर्योग वे योग हैं जिनमे आरम्भ किये गए कार्यों में असफलता और निराशा हाथ लगती है. इन योगों में आरम्भ अथवा प्रतिष्ठित किये गए कार्यों का प्रतिफल हानि, संकट और कष्ट के रूप में सामने आता है. कई बार तो व्यक्ति इन योगों के फलस्वरूप मृत्युतुल्य कष्ट पाता है या फिर उसकी मृत्यु ही हो जाती है.
कुयोग या दुर्योग इस प्रकार से बनते हैं –

1. कालदण्ड – रविवार को यदि भरणी, सोमवार को आर्द्रा, मंगलवार को मघा, बुधवार को चित्रा, गुरूवार को ज्येष्ठा, शुक्रवार को अभिजित और शनिवार को पूर्वाभाद्रपद नक्षत्र हो तो यह कुयोग बनता है. इसके परिणाम स्वरुप मृत्युतुल्य कष्ट की संभावना होती है.

2. वज्र – रविवार को यदि आश्लेषा, सोमवार को हस्त, मंगलवार को अनुराधा, बुधवार को उत्तराषाढ़ा, गुरूवार को शतभिषा, शुक्रवार को अश्विनी और शनिवार को मृगशिरा नक्षत्र हो तो यह योग बनता है. इसके परिणामस्वरूप हानि की संभावना होती है.

3. लुम्बक – रविवार को स्वाति, सोमवार को मूल, मंगलवार को श्रवण, बुधवार को उत्तराभाद्रपद, गुरूवार को कृतिका, शुक्रवार को पुनर्वसु और शनिवार को पूर्वाफाल्गुनी नक्षत्र हो तो यह योग होता है. इसके परिणामस्वरूप धनहानि की संभावना होती है.

4. उत्पात – रविवार को विशाखा, सोमवार को पूर्वाषाढ़ा, मंगलवार को धनिष्ठा, बुधवार को रेवती, गुरूवार को रोहिणी, शुक्रवार को पुष्य और शनिवार को उत्तराफाल्गुनी नक्षत्र हो तो यह योग होता है. इसके परिणामस्वरूप प्राणों को भय रहता है.

5. मृत्यु – रविवार को अनुराधा, सोमवार को उत्तराषाढ़ा, मंगलवार को शतभिषा, बुधवार को अश्विनी, गुरूवार को मृगशिरा, शुक्रवार को आश्लेषा और शनिवार को हस्त नक्षत्र हो तो यह योग होता है. इसके परिणामस्वरूप मृत्यु की आशंका रहती है.

6. काण – रविवार को ज्येष्ठा, सोमवार को अभिजित, मंगलवार को पूर्वाभाद्रपद, बुधवार को भरणी, गुरूवार को आर्द्रा, शुक्रवार को मघा और शनिवार को चित्रा नक्षत्र हो तो यह योग होता है. इसके परिणामस्वरूप क्लेश की आशंका होती है.

7. मूसल – रविवार को अभिजित, सोमवार को पूर्वाभाद्रपद, मंगलवार को भरणी, बुधवार को आर्द्रा, गुरूवार को मघा, शुक्रवार को चित्रा और शनिवार को ज्येष्ठा नक्षत्र हो तो यह योग होता है. इसके परिणामस्वरूप धनहानि की सम्भावना होती है.

8. गदा – रविवार को श्रवण, सोमवार को उत्तराभाद्रपद, मंगलवार को कृतिका, बुधवार को पुनर्वसु, गुरूवार को पूर्वाफाल्गुनी, शुक्रवार को स्वाति और शनिवार को मूल नक्षत्र हो तो यह योग होता है. इसके परिणामस्वरूप रोग की सम्भावना रहती है.

9. रक्ष – रविवार को शतभिषा, सोमवार को अश्विनी, मंगलवार को मृगशिरा, बुधवार को अश्लेषा, गुरूवार को हस्त, शुक्रवार को अनुराधा और शनिवार को उत्तराषाढ़ा नक्षत्र हो तो यह नक्षत्र होता है. इसके परिणामस्वरूप महाकष्ट की सम्भावना होती है.

10. यमदंष्ट्र – रविवार को मघा, धनिष्ठा सोमवार को विशाखा, मूल मंगलवार को भरणी, कृतिका बुधवार को पुनर्वसु, रेवती गुरूवार को अश्विनी, उत्तराषाढ़ा शुक्रवार को रोहिणी, अनुराधा और शनिवार को श्रवण या शतभिषा नक्षत्र हो तो यह योग होता है. इस योग में कार्य करने से असफलता प्राप्त होती है.

11. यमघण्ट – रविवार को मघा, सोमवार को विशाखा, मंगलवार को आर्द्रा, बुधवार को मूल, गुरूवार को कृतिका, शुक्रवार को रोहिणी और शनिवार को हस्त नक्षत्र हो तो यह योग होता है. इस योग को शुभकार्यों और यात्रा के लिए निषिद्ध माना गया है.

12. ज्वालामुखी – जैसा की नाम से ही स्पष्ट है यह एक खतरनाक योग है. इसकी भी मूल की ही भांति शांति कराई जाती है. प्रतिपदा तिथि को मूल, पंचमी को भरणी, षष्ठी को कृतिका, नवमी को रोहिणी और दशमी को आश्लेषा नक्षत्र हो तो यह योग होता है. इसमें समस्त शुभ कार्य वर्जित हैं.

13. दग्ध नक्षत्र – रविवार को भरणी, सोमवार को चित्रा, मंगलवार को उत्तराषाढ़ा, बुधवार को धनिष्ठा, गुरूवार को उत्तराफाल्गुनी, शुक्रवार को ज्येष्ठा और शनिवार को रेवती नक्षत्र हो तो नक्षत्र दग्ध हो जाता है. दग्ध नक्षत्र किसी भी शुभ कार्य के लिए निषिद्ध होता है.

14. घात नक्षत्र – प्रत्येक राशि का एक घात नक्षत्र होता है. जैसे की मेष का मघा, वृषभ का हस्त, मिथुन का स्वाति, कर्क का अनुराधा, सिंह का मूल, कन्या का श्रवण, तुला का शतभिषा, वृश्चिक का रेवती, धनु का भरणी, मकर का रोहिणी, कुम्भ का आर्द्रा और मीन का अश्लेषा.
प्रत्येक राशि को शुभ कार्य करते समय अपने घात नक्षत्र का त्याग करना चाहिए अन्यथा हानि और संकटों का सामना करना पड़ सकता है.

15. जन्म नक्षत्र – जन्म नक्षत्र और उसका दसवां तथा उन्नीसवां नक्षत्र जन्म नक्षत्र कहलाते हैं. शुभ कार्यों के लिए इनका निषेध कहा गया है वरना हानि होती है.