Category Archives: पूजा पाठ

शरद पूर्णिमा

अश्विन मास की पूर्णिमा शरद पूर्णिमा के नाम से जानी जाती है.
ज्योतिष अनुसार शरद पूर्णिमा के चंद्र को सौलह कला संपूर्ण माना जाता है. इस रात्रि चंद्र अपने पूर्ण वैभव के साथ दिखाई देता है.

शरद पूर्णिमा का संबंध माता लक्ष्मी से है. इस दिन माता लक्ष्मी की पूजा का विशेष विधान है.
जैसा की सभी जानते हैं चंद्र मन का कारक है. श्री सूक्त में कहा गया है ‘चंद्रा हिरणमयी लक्ष्मी’. इस दिन रात में खीर बनाकर तीन घंटे तक मिटटी या चांदी के पात्र में खुले आकाश नीचे रखने की परंपरा है. इस दिन चंद्रमा की किरणों से अमृत बरसता है. तत्पश्चात इस खीर को खाने का विधान है. मान्यता है की इससे श्वास और मन संबंधी रोग नष्ट हो जाते हैं.

शरद पूर्णिमा को ही भगवान् श्री कृष्ण ने सर्वप्रथम महारास रचा कर कामदेव का मानमर्दन किया था. इसलिए यह महारास पूर्णिमा भी कही जाती है.

इसे कोजागरी पूर्णिमा भी कहते हैं जो की संस्कृत शब्द कोजागृत का अपभ्रंश है. इसका अर्थ है कौन जागा है ?
इस रात्रि जागरण की बड़ी महिमा है. चंद्र को निहारते हुए उसकी किरणों द्वारा पोषित खीर का नैवेद्य माता लक्ष्मी को अर्पित कर और प्रसाद रूप स्वयं ग्रहण कर भौतिक और मानसिक समृद्धि प्राप्त होती है …

 

 

अलग वस्तुएं हैं कुमकुम और सिन्दूर

भारतीय पूजा उपासना और लोक व्यवहार में कुमकुम और सिन्दूर का बहुत महत्व है.

दोनों ही वस्तुओं को अत्यंत शुभ और पवित्र माना गया है. कई बार कुमकुम और सिन्दूर को एक समझने की भूल लोगों द्वारा कर ली जाती है लेकिन ऐसा नहीं है. ये दोनों बिलकुल अलग पदार्थ हैं और दोनों का उपयोग भी बिलकुल अलग है.

कुमकुम जिसे रोली भी कहा जाता है एक पूजा और सम्मान की वस्तु है जिसे मस्तक पर धारण किया जाता है. तिलक लगाने के लिए जो पदार्थ प्रयोग होता है वह कुमकुम है. स्वास्तिक एवं अन्य सौभाग्यवर्धक चिन्ह भी कुमकुम से ही उकेरे जाते हैं. वधु के गृहप्रवेश पर उसके पैरों और हाथों की छाप के लिए भी कुमकुम ही इस्तेमाल होता है. व्यापारी वर्ग द्वारा नववर्ष आरम्भ पर अपने बही खातों पर कुमकुम से शुभ चिन्ह अंकित कर इसके छींटे दिए जाते हैं जिसे सुख समृद्धि का प्रतीक माना जाता है.
कुमकुम हल्दी से बनने वाला पदार्थ है. हल्दी और चूने के पानी के संयोग से रासायनिक प्रक्रिया होती है और उसका रंग बदल कर लाल हो जाता है. यही कुमकुम है.

जबकि सिन्दूर एक श्रृंगारिक पदार्थ है जिसका उपयोग सुहागिन स्त्रियों द्वारा श्रृंगार के तौर पर किया जाता है. पूजा उपासना में भी हनुमान और भैरव का श्रृंगार सिन्दूर द्वारा करने की परंपरा है जिसे चोला चढ़ाना कहते हैं.
सिन्दूर का रसायनिक नाम मरक्यूरिक सल्फाइड है. मरक्यूरिक सल्फाइड प्राकृतिक खनिज रूप में पृथ्वी पर पाया जाता है. हिंदी में इसे सिंगरिफ और अंग्रेजी में Cinnabar कहते हैं. इसी सिंगरिफ का पिसा हुआ रूप सिन्दूर या Vermillion कहलाता है.

नवग्रह बीजमंत्र / जप संख्या और जप समय

कष्ट निवारण और ग्रहपीड़ा शांति हेतु हिन्दू परंपरा में नवग्रहों के बीजमंत्र जप का विधान है. कष्टों और पीड़ा का संबंध जिस ग्रह से हो उसके बीजमंत्र जप बहुत लाभ देते हैं. विधिपूर्वक जप पूर्ण कर लेने पर संबंधित ग्रह की कृपा प्राप्त होती है और कष्टों का निवारण सहज ही हो जाता है.

नवग्रह मंत्र और जप संख्या इस प्रकार से हैं –

सूर्य – ॐ ह्रां ह्रीं ह्रौं स: सूर्याय नमः
जप संख्या – 7000
जप समय – सूर्योदय काल

चंद्रमा – ॐ श्रां श्रीं श्रौं स: चंद्राय नमः
जप संख्या – 11000
जप समय – संध्याकाल

मंगल – ॐ क्रां क्रीं क्रौं स: भौमाय नमः
जप संख्या – 10000
जप समय – दिन का प्रथम प्रहर

बुध – ॐ ब्रां ब्रीं ब्रौं स: बुधाय नमः
जप संख्या – 9000
जप समय – मध्याह्न काल

बृहस्पति – ॐ ग्रां ग्रीं ग्रौं स: गुरवे नमः
जप संख्या – 19000
जप समय – प्रात:काल

शुक्र – ॐ द्रां द्रीं द्रौं स: शुक्राय नमः
जप संख्या – 18000
जप समय – ब्रह्मवेला

शनि – ॐ प्रां प्रीं प्रौं स: शनैश्चराय नमः
जप संख्या – 23000
जप समय – संध्याकाल

राहु – ॐ भ्रां भ्रीं भ्रौं स: राहवे नमः
जप संख्या – 18000
जप समय – रात्रिकाल

केतु – ॐ स्रां स्रीं स्रौं स: केतवे नमः
जप संख्या – 17000
जप समय – रात्रिकाल

जप संकल्प करने पर प्रतिदिन कम से कम एक माला (108 बार) जप आवश्यक है… Japa Yoga 1

शंख एक चमत्कारिक वस्तु

शंख हिन्दू पूजा कार्यों में प्रयुक्त होने वाली अति महत्वपूर्ण वस्तु है.

पूजा पाठ के अलावा हिन्दू मान्यता में किसी भी शुभकार्य के प्रारंभ में शंखनाद की परंपरा है.
शंख एक चमत्कारिक वस्तु है और इसके विभिन्न उपयोग हतप्रभ कर देने वाले हैं.

जहां इसका उपयोग है वहां सुख समृद्धि शान्ति आरोग्य का वास होता है.

मूल रूप से शंखों के तीन प्रकार होते हैं. दक्षिणावृत्ति, मध्यावृत्ति और वामावृत्ति शंख. इनमे दक्षिणावृत्ति शंख दुर्लभ प्रकार है.

कहावत है की ‘शंख बाजे राक्षस भाजे’. अथर्ववेद में कहा गया है ‘शंखेन हत्वा रक्षांसि’ अर्थात शंख राक्षसों का नाश करता है. आज आधुनिक विज्ञान भी इस बात से सहमत है की शंख ध्वनि अनेकों हानिकारक रोगाणुओं और जीवाणुओं को नष्ट कर देती है.

घर अथवा प्रतिष्ठान की नकारात्मक ऊर्जा को भी शंखनाद द्वारा ख़त्म किया जा सकता है.

इसके अलावा शंख भस्म, शंख जल और शंखनाद का प्रयोग अनेकों बीमारियों जैसे शरीर में पित्त का बढ़ना, श्वास रोग, ह्रदय दौर्बल्य, तोतलापन, पेट की सूजन और अल्सर, मुखविकार, स्नायुविकार, श्रवणविकार आदि में बहुत उपयोगी माना गया है.

शंख को शकुन वस्तु के रूप में भी प्रयुक्त किया जाता है.

11406994_886451084756096_4145992253713241407_nदुकान प्रतिष्ठान की तिजोरी और गल्ले में इसे रखने से आय में वृद्धि होती है. शंख की उत्पत्ति देवी लक्ष्मी की ही भांति समुद्र से हुई है इसलिए इसे देवी लक्ष्मी का भाई माना गया है. घर पर इसकी स्थापना सुख समृद्धि में करती है और घर के समस्त वास्तुदोष नष्ट हो जाते हैं…

मलाई मंदिर

नई दिल्ली के आरके पुरम इलाके में एक दक्षिण भारतीय शैली का बहुत सुंदर मंदिर है.

इस मंदिर का नाम है मलाई मंदिर. मलाई मलय शब्द का अपभ्रंश है.

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यह विशेष रूप से भगवान् स्वामीनाथा ( कार्तिकेय ) का मंदिर है लेकिन इसके परिसर में श्री गणेश , भगवान् शम्भुनाथ , नवग्रह , देवगुरु बृहस्पति और उत्तरमुखी दुर्गा माता के भी मंदिर हैं. इस मंदिर में भगवान् स्वामीनाथा एक ऊंची पहाड़ी पर विराजमान हैं.

यह मंदिर अपनी स्थापत्य कला , परिवेश , पूजापाठ और पुजारियों के निष्कपट व्यवहार से सहज ही मन मोह लेता है.

हिन्दू पूजा पद्धति का आदि रूप यहाँ स्पष्टता से दृष्टि गोचर होता है. यहाँ सभी प्रकार के दोष निवारण हेतु शास्त्रोक्त विधि से पूजा , यज्ञ और अभिषेक की सुविधा मौजूद है. वो भी अत्यधिक न्यून व्यय पर. फुरसत के क्षणों में इस मंदिर में आना एक सुखद एहसास है.

मंगलजनित कष्ट और दोष भगवान् स्वामीनाथा की पूजा और अभिषेक से निश्चित तौर पर कट जाते हैं ऐसा मेरा अनुभव रहा है.

इस मंदिर में उत्तरमुखी दुर्गा माता की उपासना राहु जनित कष्ट के लिए अमोघ है.

मंगलवार और शुक्रवार को राहु काल में भक्त पीले नींबू के छिलके का कटोरीनुमा दीया बनाकर उसमे तिल के तेल से रूई की बाती जलाते हैं और दुर्गामाता को यह दीप अर्पित करते हैं. इससे राहु जनित दोष सदा के लिए शांत हो जाते हैं.

साथ ही ध्यान रखें की मंदिर के मुख्यद्वार पर एक दक्षिण भारतीय सज्जन इडली , वडा और मसाला वडा सांबर के साथ बेचते हैं. वो भी ना खाना भूलें. उसके स्वाद का भी अलग ही मजा है…

पूजा

पूज रहे हैं हनुमान को लेकिन दिन भर कामुक चिंतन.

इसे देख उसे देख आहें भरना. खाद्य अखाद्य का कोई बोध नहीं. अहंकार इतना की नैपोलियन बोनापार्ट फेल.सेवा भाव का चित्त में नितांत अभाव.

देवी लक्ष्मी के पूजा पाठ में रत हैं क्योंकि धन चाहिये , सुख और सौहाद्र चाहिये. परंतु जीवन में स्वच्छता का मूल्य ही नहीं. दिनभर गुटखा पान चबा रहे हैं.

स्नान , शुद्धि और वस्त्रों की स्वच्छता के प्रति उदासीन हैं. स्त्रियों के लिये सम्मान की रत्ती भर भावना मन में नहीं.
बाहर की तो बात छोड़ो गृहलक्ष्मी ही सिसक रही है.

ऐसे लोग जीवन भर 1496691_886884241379447_2810840778898424414_n में लगें रहें तो भी फल प्राप्ति नहीं होगी. क्योंकि देवी देवता की साधना भाव की साधना है.
प्रत्येक देवी देवता का निश्चित स्वभाव है. उस स्वभाव को धारण करके ही देवी देवता विशेष की अनुकंपा प्राप्त की जा सकती है. अन्य कोई उपाय नहीं…