Category Archives: ज्योतिष

त्यौहार ना मनाने का ज्योतिषीय कारण

ज्योतिष अनेक प्रकार के पूर्व ऋणों की चर्चा करता है और इनमें से एक है स्व: ऋण.
कुंडली के पंचम भाव में यदि शुक्र, शनि, राहु और केतु में से कोई अकेले विराजमान हो तो स्व: ऋण होता है.
इस ऋण के कारण जातक त्यौहार और खुशियां मनाने से परहेज करता है. उसे अपने परंपरागत रीति रिवाज मानने में भी पीड़ा होती है.

अपनी परम्पराओं का निरादर कर वह विजातीय धर्मों और रीतिरिवाजों में रूचि और सहानुभूति रखता है.
त्यौहार ना मनाने के लिए वह अनेक तर्क देता है और दूसरों को भी ऐसा ही करने के लिए प्रेरित करता है.
अपनी अंतरात्मा को कुचलना इस ऋण का कारण माना गया है.
जो लोग अपने विवेक और अंतरात्मा को लगातार मारते रहते हैं वे इस ऋण के शिकार हो जाते हैं.

स्त्रियों के लिए सौभाग्यशाली है हीरे की लौंग

नाड़ी ज्योतिष में बृहस्पति नाक का कारक है. साथ ही बृहस्पति वृद्धि, सौभाग्य और शुभता का कारक भी है. नाड़ी में स्त्रियों का जीवकारक शुक्र को माना गया है. हीरा शुक्र का रत्न है. जब स्त्रियां हीरे की लौंग को नाक में धारण करती हैं तो माना जाता है की जीव शुक्र का सम्बन्ध बृहस्पति यानि वृद्धि, सौभाग्य और शुभता से बन जाता है.

इसीलिए भारत में परंपरा है की स्त्रियां नाक में सच्चे हीरे की लौंग धारण करें जिससे उनके जीवन में सुख, सौभाग्य और समृद्धि का समावेश रहे.

बेहतर आजीविका के लिए दान उपाय

आजीविका की चुनौतियों से निबटने के लिए दशमेश की कुंडली में स्थिति और उस स्थिति के अनुरूप दान एक बहुत ही कारगर उपाय है. इस विशेष दान उपाय को करने से दशमेश अत्याधिक बल पाता है और आजीविका पर छाये संकट के बादल छंट जाते हैं.
हिन्दू मान्यता अनुसार सतयुग में ब्रह्म का निवास शब्द में, त्रेता में आकाश में, द्वापर में जल में और कलयुग में अन्न में माना गया है. कलयुग में अन्न दान सबसे बड़ा दान है. इसीलिए इस उपाय के लिए अन्न दान को प्राथमिकता देना आदर्श है.

दशमेश की विभिन्न भाव स्थिति अनुसार दान पदार्थ निम्न प्रकार से हैं –

1. दशमेश प्रथम भाव में – दान पदार्थ : आटे के लडडू, आटे का हलवा, मीठी रोटी, गुड़ रोटी
2. दशमेश द्वितीय भाव में – दान पदार्थ : कढ़ी चावल
3. दशमेश तृतीय भाव में – दान पदार्थ : मूंग दाल हलवा, मूंग दाल बर्फी
4. दशमेश चतुर्थ भाव में – दान पदार्थ : दूध और दूध से बनी सफेद मिठाईयां, खीर
5. दशमेश पंचम भाव में – दान पदार्थ : आटे के देसी घी के लडडू और हलवा, देसी घी पिन्नी,देसी घी पंजीरी
6. दशमेश षष्टम भाव में – दान पदार्थ : मूंग दाल हलवा, मूंग दाल बर्फी
7. दशमेश सप्तम भाव में – दान पदार्थ : दही, लस्सी, छाछ, खट्मिट्ठे रसदार फल
8. दशमेश अष्टम भाव में – दान पदार्थ : तिल की मिठाईयां, काले रंग की मिठाईयां
9. दशमेश नवम भाव में – दान पदार्थ : बेसन से बनी देसी घी की मिठाईयां
10. दशमेश दशम भाव में – दान पदार्थ : मूंग और उड़द दाल पापड़
11. दशमेश एकादश भाव में – दान पदार्थ : चना उड़द मिक्स दाल, चना उड़द पापड़
12. दशमेश द्वादश भाव में – दान पदार्थ : चना उड़द मिक्स दाल, चना उड़द पापड़

योग जो कभी निष्फल नहीं होते

ज्योतिष में कुछ ऐसे समीकरण और स्थितियां हैं जिन्हें अद्भुत रूप से सदा अपना फल देते पाया गया है.

ऐसे समीकरणों में से कुछ निम्न प्रकार हैं –

मकर राशि का जातक जीवन में कम से कम एक बार भयंकर पतन जरूर झेलता है.

चतुर्थ मंगल जीवन को स्थिर नहीं होने देता. जातक सदा खुद को त्रिशंकु और खोखला सा महसूस करता है.

मकर राशि में तीन से अधिक ग्रहों की युति व्यक्ति को जीवन में पराजित और कलंकित करती है.

बृहस्पति चंद्र का परस्पर दशांतर नुक्सान और भय का फलित करता है.

मंगल शुक्र की 6 डिग्री तक की युति अवैध यौन संबंधों की गारंटी है.

मेष लग्न में धैर्य की भारी कमी होती है, इन्तजार इसके बस की बात नहीं.

लग्नस्थ शनि जीवन को संघर्षमय बना देता है. आजीविका की चुनौतियां पिंड ही नहीं छोड़तीं.

सप्तम बुध वाला जातक पारस पत्थर हो जाता है. दूसरों को तो सोना कर देता है पर खुद पत्थर ही रह जाता है.

चंद्र के साथ जब राहु शनि या शनि मंगल युति करते हैं तो चिंताएं और तनाव जीवन भर पीछा ही नहीं छोड़ते.

बृहस्पति शुक्र युति अप्राकृतिक और अस्वीकृत यौन रूचि का परिचायक हैं.

किसने निकाला था भारत की आजादी का मुहूर्त

देश के नियंताओं ने देश की आजादी के लिये 15 अगस्त 1947 की शुरुआत यानी अर्धरात्रि को चुना.
क्योंकि इसके पीछे उनकी ज्योतिष के प्रति गहन आस्था थी.
उज्जैन के तत्कालीन महान ज्योतिषी पद्म भूषण पंडित सूर्यनारायण व्यास ने इस मुहूर्त को चुना था.
भारत के प्रथम राष्ट्रपति डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद व्यास जी के बड़े भक्त थे. अंग्रेजों ने भारत और पाकिस्तान की स्वतंत्रता के लिए 14 और 15 अगस्त की दो तारीखें तय की थीं. इन्हीं तारीखों में से दोनों ने अपना समय चुनना था.
दिलचस्प बात ये है की व्यास जी ने 1938 में ही अपने एक ज्योतिषीय लेख में भारत की स्वतंत्रता तिथी 15 अगस्त 1947 घोषित कर दी थी.
उनके अनुसार यह मुहूर्त स्थिर लग्न में था जिसके कारण भारत का लोकतंत्र सदा स्थिर रहेगा और आने वाले वर्षों में यह राष्ट्र विश्व का सिरमौर बनेगा.

व्यास जी ने गांधी वध भी 1924 में ही घोषित कर दिया था. उन्होंने एक लेख में लिखा था गांधी की स्वाभाविक मृत्यु नही होगी वे मारे जायेंगे उनकी हत्या एक ब्राह्मण करेगा.
ऐसे ही नेहरू का भी तमाम भविष्य व्यास जी ने खोलकर रख दिया था और वे कितने साल राज करेंगे यह भी आजादी से पहले ही बता दिया था तब नेहरू का कद बहुत छोटा था और लोगों को एकाएक इस बात पर विशवास नहीं हुआ था.
नेहरू भी व्यास जी से परामर्श लिया करता था लेकिन इस बात को छिपाया जाता था क्योंकि नेहरू ने अपनी छवि एक सेक्युलर की बना रखी थी.

लाल बहादुर शास्त्री द्वारा अमावस्या के दिन प्रधानमन्त्री पद की शपथ लेने को भी व्यास जी ने बहुत गलत बताया था.
शास्त्री जी भी व्यास जी को बहुत मानते थे पर उन्होंने बात हंसी में उड़ा दी. शास्त्री जी जब ताशकंद जाने लगे तब पंडित सूर्यनारायण व्यास जी ने ‘हिंदी हिंदुस्तान’ में एक लेख लिखा की शास्त्री जी ताशकंद से जीवित नहीं लौटेंगे. संपादक ने यह लेख छपने से रोक लिया और शास्त्री जी तक यह अनहोनी पहुंचाई.
शास्त्री जी बात को टाल गए. ताशकंद में शास्त्री जी की मृत्यु के बाद अखबार ने इस टिप्पणी के साथ लेख छापा की यह लेख उन्हें शास्त्री जी की मृत्यु से पहले ही मिल चुका था.

मोरारजी देसाई के बारे में प्रचारित था की वह ज्योतिष पर बिलकुल विशवास नहीं करते लेकिन उन्होंने भी बंबई राज्य की स्थापना का मुहूर्त व्यास जी से निकलवाया था.
पंडित सूर्यनारायण व्यास जी से इंदिरा गांधी ने भी ज्योतिषीय परामर्श लिया था. व्यास जी ने इंदिरा गांधी और उनके दोनों पुत्रों की अप्राकृतिक मृत्यु के विषय में भी बता दिया था लेकिन इस बात को दफन कर दिया गया.

1936 में ब्रिटिश सम्राट एडवर्ड अष्टम की भारत यात्रा अफवाहों पर भी व्यास जी ने स्पष्ट भविष्यवाणी कर दी थी की वे भारत नहीं आएंगे और उनकी गद्दी के दिन अब गिने चुने हैं.
ऐसा ही हुआ सम्राट भारत नहीं आये और कुछ ही दिन बाद एक अमेरिकन महिला लेडी सिम्पसन से विवाह करने से उठे विवाद में सम्राट को सिंहासन छोड़ना पड़ा. इतना ही नहीं हिटलर भी व्यास जी का भक्त था और उनसे ज्योतिषीय परामर्श लेता था…

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मांगलिक दोष

विवाह के लिए कुंडली मिलान में सर्वप्रथम जो चीज देखी जाती है वह है मांगलिक दोष. ज्योतिषीय मान्यता है की मांगलिक का विवाह मांगलिक से ही होना चाहिए अन्यथा वैवाहिक जीवन कठिन हो जाता है अथवा पति पत्नी दोनों में से जो मांगलिक नहीं है उसे मृत्युतुल्य कष्ट संभव है.
जन्म कुंडली में जब मंगल प्रथम, द्वितीय, चतुर्थ, सप्तम, अष्टम अथवा द्वादश भाव में होता है तब व्यक्ति मांगलिक दोष का शिकार हो जाता है. जैसा की विदित है की मंगल चतुर्थ, सप्तम और अष्टम दृष्टि रखता है. उपरोक्त वर्णित मांगलिक स्थितियों में मंगल अपनी स्थिति और दृष्टि द्वारा सप्तम और अष्टम भावों को प्रभावित करता है.
सप्तम भाव पति या पत्नी और अष्टम भाव यौन सुख का प्रतिनिधित्व करता है. मंगल का स्वभाव है की वह जिस भाव में बैठता है अथवा जिन भावों पर दृष्टि डालता है उन्हें उत्तप्त कर देता है यानि उनके गुण दोषों में वृद्धि कर देता है. मांगलिक दोष की स्थिति में मंगल सप्तम जो की विपरीत लिंगी भाव है और अष्टम जो की कामचेष्टा और यौन क्षमता भाव है में भारी वृद्धि कर देता है. मांगलिक दोष वाला व्यक्ति सामान्य व्यक्ति के मुकाबले अधिक कामुक और कामचेष्टा संपन्न हो सकता है. अब चूंकि व्यक्ति समाज में रहता है और समाज यौन उच्छृंखलता की इजाजत नहीं देता इसीलिये इसे दोष रूप में निरुपित किया गया है.
इसीलिये कहा गया है की मांगलिक के साथ मांगलिक का विवाह हो ताकि गाड़ी के दोनों पहिए एक समान हों.
कई बार कहा जाता है की वर वधु में से एक मांगलिक हो और दूसरे के उसी भाव में यदि शनि, राहु अथवा केतु बैठे हों तो यह योग नष्ट हो जाता है. लेकिन इसके पीछे का तर्क समझ में नहीं आता की आखिर किस आधार पर ऐसा कहा गया है.

व्यक्ति तीन प्रकार से मांगलिक दोष से ग्रस्त होता है – पहला लग्न से, दूसरा जन्मस्थ चंद्र से और तीसरा जन्मस्थ शुक्र से. इनमे शुक्र वाली अवस्था सबसे उग्र और चंद्र वाली सबसे हल्की मानी जाती है. यदि व्यक्ति तीनों ही स्थितियों में मांगलिक हो तो वह प्रबल मांगलिक माना जायेगा.

मांगलिक दोष की शांति के लिए परंपरागत रूप से कुंभ विवाह, सावित्री पूजन और मंगल गौरी वट पूजन प्रचलित पूजाएं हैं.

अणु और ऋणु

यह वह ज्योतिषीय अवस्थाएं हैं जिनके द्वारा मानव मन का संयोजन और विघटन औसत रूप में परिभाषित किया जा सकता है.
कालपुरुष की प्रथम राशि मेष अणु कहलाती है. इसका स्वामी मंगल है, यहां से मानव जीवन आरंभ होता है.

यूं तो कुंडली के प्रथम भाव का नैसर्गिक कारक सूर्य है जो की आत्मा का द्योतक है लेकिन कालपुरुष की प्रथम अभिव्यक्ति मंगल है. इसलिए स्पष्ट ही कहा जा सकता है आत्मा रुपी सूर्य की सांसारिक अभिव्यक्ति मंगल है.

मेष संयोजन और अभियान राशि है. इसे भूमि से अतिशय प्रेम है और बलवती होने पर प्रचुरता से अचल संपत्ति का निर्माण करती है. स्वभाव से यह क्षत्रिय है. मानवीय अहम, समस्त भौतिक अभियान, मारकाट, जमींदारी, लालसा और लोलुपता इसी का अधिकार क्षेत्र हैं. देवताओं के सेनापति भगवान कार्तिकेय इस राशि के अधिदेवता माने गए हैं. मेष का रंग चमकता लाल है.

इस राशि के साथ एक दुर्भावना भी जुड़ी है और वह है इसका विपरीत लिंगीय संबंध, इस मामले में यह दुर्भाग्यशाली राशि है. क्योंकि ऋणु राशि तुला इसके सप्तम भाव का प्रतिनिधित्व करती है.

ऋणु द्वारा वह संयोजन विघटित होता दिखता है जो अणु द्वारा संयोजित हुआ था. इसकी प्रतिनिधि राशि तुला और स्वामी शुक्र है.

हालांकि विघटन के संकेत पूर्व राशि कन्या से ही मिलने लगते हैं जो की आश्रितों के लिए निकम्मी राशि है. कन्या राशि अपने किसी भी उत्तरदाई को सुखद आश्वासन नहीं देती. इससे उम्मीद बांधना दुखों को निमंत्रण देता है.

तुला राशि सांसारिक अर्थों में सर्वाधिक दुर्भाग्यपूर्ण राशि है. मौज मारते दिखते हुए भी इसके जातक दुखों की सूली पर टंगे होते हैं. इनके जीवन से संघर्ष और तनाव मानो कभी विदा ही नहीं होते. जीवन में कभी भी ऐसा दिन नहीं आता जिसे यह सुखद कह आनंद मना सकें.

इसका कारण है मेष के अणु द्वारा संयोजित मन के तुला के ऋणु द्वारा विघटन की प्रक्रिया का आरंभ. मेष से कन्या तक संयोजन और तुला से मीन तक विघटन की गाथा है ज्योतिष.
जो बना है उसे मिटना भी है, यही जीवन है.

बलकटी स्त्रियां होती हैं दुर्भाग्यशाली

अनुभव में पाया गया है की लड़कों जैसे छोटे बाल रखने वाली स्त्रियां दुखी रहती हैं.

वे भले ही उच्च पदस्थ अथवा धनी हों उनके जीवन में सुख नहीं होता. खासतौर पर पति सुख या विपरीत लिंगी सुख. ऐसी स्त्रियों को पुरुषों के प्यार और सहानुभूति की तलाश में भटकते देखा जा सकता है. यदि वे विवाहित हैं तो पति से नहीं बनती और अलगाव की स्थिति बन जाती है और अधिकांश मामलों में पति से संबंध विच्छेद हो भी जाता है.

इसका कारण ज्योतिष में छिपा है. कालपुरुष कुंडली का सप्तम भाव शुक्र का भाव है. यहां शुक्र की मूलत्रिकोण राशि तुला विराजमान है. सप्तम भाव सौंदर्य और कला का भाव है, साथ ही यह विपरीत लिंगी और जीवनसाथी का भी प्रतिनिधित्व करता है.

शुक्र सौंदर्य, भोग विलास और प्रसन्नता का कारक ग्रह है. लंबे और सुंदर केश स्त्रियों का आधारभूत सौंदर्य हैं, इनके बाद ही सौंदर्य की अन्य उपमाओं का नंबर आता है. जब स्त्री द्वारा अपने केशों को कटवा कर छोटा कर लिया जाता है तो शुक्र बुरी तरह पीड़ित हो जाता है और अशुभ परिणाम देने लगता है.

हिन्दू समाज में किसी की मृत्योपरांत पारिवारिक सदस्यों का मुंडन और किसी सन्यासी परंपरा के अनुसरण द्वारा पुरुषों का गंजा रहना भी इसी सत्य को प्रतिपादित करता है. यह भी शुक्र को निर्बल करने की प्रक्रिया है.

शनि शिंगणापुर स्त्रियों द्वारा तैलार्पण निषेध के कारण

स्त्रियों द्वारा शनि शिंगणापुर में शनिदेव को तैलार्पण निषेध के पीछे गहरा राज छिपा है जो स्त्रियों के ही हित में है.

सभी सनातन मान्यताएं अपने में गहन अर्थ लिए हैं भले ही आज उनके अर्थ विस्मृत हो गए हों और यह परंपरा भी इससे अछूती नहीं है.

शनि पाप ग्रह और ब्रह्माण्डीय न्यायाधीश है. शनि वैराग्य का कारक है. इससे प्रभावित व्यक्ति सांसारिक मोह से विमुक्त हो वैराग्य धारण करता है. इसकी दृष्टि अधो है जिसका अर्थ है की यह अपनी प्रचण्ड वैराग्यात्मक ऊर्जा को सतत पृथ्वी में निसृत करता रहता है.

परमात्मा की नवग्रह शक्ति वितरण व्यवस्था में शनि का मुख्य कार्य जीव को उसके कर्मों का फल प्रदान कर निर्मल करना है. मन के संयोजक मंगल के विपरीत यह मन को विखंडित करने की प्रक्रिया का कारक है.

शनि वायु का कारक और लिंग में नपुंसक है. वायु का प्रभाव वैचारिक भटकाव की आशंका उत्पन्न करता है.

शनि तैलार्पण शनि से उत्सर्जित हो रही वैराग्यात्मक ऊर्जा का बृहस्पति (तेल) द्वारा शमन है. पुरुषों को अनुमति है की वे अपना कुछ बृहस्पति अंश (धन एवं ज्ञान) इस प्रक्रिया हेतु व्यय कर सकते हैं.

लेकिन सनातन व्यवस्था स्त्रियों को इसकी अनुमति कदापि नहीं देती. स्त्रियों की प्रकृति पृथ्वी के समान ग्राहीय है और उन पर जन्म की महत् जिम्मेदारी है. उनके लिए वैराग्य की अपेक्षा भक्ति पर जोर दिया गया है.

भगवान श्रीकृष्ण द्वारा भी स्त्रियों के लिए संन्यास की बजाय भक्ति धारा निर्मित करने के प्रयास हुए.

सनातन दर्शन स्त्रियों को बृहस्पति अंश व्यय की बिलकुल अनुमति नहीं देता क्योंकि बृहस्पति स्त्रियों की कुंडली में पति, संतान (विशेषतया पुत्र), विनम्रता और बुजुर्गों के सम्मान का कारक है. शनि तैलार्पण से उनके पति और संतान को भय हो सकता है, साथ ही उनके स्वभाव का आधारभूत गुण विनम्रता उदंडता में परिवर्तित हो सकता है जो की परिवार और समाज के बिखराव का कारण होगा.

कुयोग या दुर्योग

कुयोग या दुर्योग वे योग हैं जिनमे आरम्भ किये गए कार्यों में असफलता और निराशा हाथ लगती है. इन योगों में आरम्भ अथवा प्रतिष्ठित किये गए कार्यों का प्रतिफल हानि, संकट और कष्ट के रूप में सामने आता है. कई बार तो व्यक्ति इन योगों के फलस्वरूप मृत्युतुल्य कष्ट पाता है या फिर उसकी मृत्यु ही हो जाती है.
कुयोग या दुर्योग इस प्रकार से बनते हैं –

1. कालदण्ड – रविवार को यदि भरणी, सोमवार को आर्द्रा, मंगलवार को मघा, बुधवार को चित्रा, गुरूवार को ज्येष्ठा, शुक्रवार को अभिजित और शनिवार को पूर्वाभाद्रपद नक्षत्र हो तो यह कुयोग बनता है. इसके परिणाम स्वरुप मृत्युतुल्य कष्ट की संभावना होती है.

2. वज्र – रविवार को यदि आश्लेषा, सोमवार को हस्त, मंगलवार को अनुराधा, बुधवार को उत्तराषाढ़ा, गुरूवार को शतभिषा, शुक्रवार को अश्विनी और शनिवार को मृगशिरा नक्षत्र हो तो यह योग बनता है. इसके परिणामस्वरूप हानि की संभावना होती है.

3. लुम्बक – रविवार को स्वाति, सोमवार को मूल, मंगलवार को श्रवण, बुधवार को उत्तराभाद्रपद, गुरूवार को कृतिका, शुक्रवार को पुनर्वसु और शनिवार को पूर्वाफाल्गुनी नक्षत्र हो तो यह योग होता है. इसके परिणामस्वरूप धनहानि की संभावना होती है.

4. उत्पात – रविवार को विशाखा, सोमवार को पूर्वाषाढ़ा, मंगलवार को धनिष्ठा, बुधवार को रेवती, गुरूवार को रोहिणी, शुक्रवार को पुष्य और शनिवार को उत्तराफाल्गुनी नक्षत्र हो तो यह योग होता है. इसके परिणामस्वरूप प्राणों को भय रहता है.

5. मृत्यु – रविवार को अनुराधा, सोमवार को उत्तराषाढ़ा, मंगलवार को शतभिषा, बुधवार को अश्विनी, गुरूवार को मृगशिरा, शुक्रवार को आश्लेषा और शनिवार को हस्त नक्षत्र हो तो यह योग होता है. इसके परिणामस्वरूप मृत्यु की आशंका रहती है.

6. काण – रविवार को ज्येष्ठा, सोमवार को अभिजित, मंगलवार को पूर्वाभाद्रपद, बुधवार को भरणी, गुरूवार को आर्द्रा, शुक्रवार को मघा और शनिवार को चित्रा नक्षत्र हो तो यह योग होता है. इसके परिणामस्वरूप क्लेश की आशंका होती है.

7. मूसल – रविवार को अभिजित, सोमवार को पूर्वाभाद्रपद, मंगलवार को भरणी, बुधवार को आर्द्रा, गुरूवार को मघा, शुक्रवार को चित्रा और शनिवार को ज्येष्ठा नक्षत्र हो तो यह योग होता है. इसके परिणामस्वरूप धनहानि की सम्भावना होती है.

8. गदा – रविवार को श्रवण, सोमवार को उत्तराभाद्रपद, मंगलवार को कृतिका, बुधवार को पुनर्वसु, गुरूवार को पूर्वाफाल्गुनी, शुक्रवार को स्वाति और शनिवार को मूल नक्षत्र हो तो यह योग होता है. इसके परिणामस्वरूप रोग की सम्भावना रहती है.

9. रक्ष – रविवार को शतभिषा, सोमवार को अश्विनी, मंगलवार को मृगशिरा, बुधवार को अश्लेषा, गुरूवार को हस्त, शुक्रवार को अनुराधा और शनिवार को उत्तराषाढ़ा नक्षत्र हो तो यह नक्षत्र होता है. इसके परिणामस्वरूप महाकष्ट की सम्भावना होती है.

10. यमदंष्ट्र – रविवार को मघा, धनिष्ठा सोमवार को विशाखा, मूल मंगलवार को भरणी, कृतिका बुधवार को पुनर्वसु, रेवती गुरूवार को अश्विनी, उत्तराषाढ़ा शुक्रवार को रोहिणी, अनुराधा और शनिवार को श्रवण या शतभिषा नक्षत्र हो तो यह योग होता है. इस योग में कार्य करने से असफलता प्राप्त होती है.

11. यमघण्ट – रविवार को मघा, सोमवार को विशाखा, मंगलवार को आर्द्रा, बुधवार को मूल, गुरूवार को कृतिका, शुक्रवार को रोहिणी और शनिवार को हस्त नक्षत्र हो तो यह योग होता है. इस योग को शुभकार्यों और यात्रा के लिए निषिद्ध माना गया है.

12. ज्वालामुखी – जैसा की नाम से ही स्पष्ट है यह एक खतरनाक योग है. इसकी भी मूल की ही भांति शांति कराई जाती है. प्रतिपदा तिथि को मूल, पंचमी को भरणी, षष्ठी को कृतिका, नवमी को रोहिणी और दशमी को आश्लेषा नक्षत्र हो तो यह योग होता है. इसमें समस्त शुभ कार्य वर्जित हैं.

13. दग्ध नक्षत्र – रविवार को भरणी, सोमवार को चित्रा, मंगलवार को उत्तराषाढ़ा, बुधवार को धनिष्ठा, गुरूवार को उत्तराफाल्गुनी, शुक्रवार को ज्येष्ठा और शनिवार को रेवती नक्षत्र हो तो नक्षत्र दग्ध हो जाता है. दग्ध नक्षत्र किसी भी शुभ कार्य के लिए निषिद्ध होता है.

14. घात नक्षत्र – प्रत्येक राशि का एक घात नक्षत्र होता है. जैसे की मेष का मघा, वृषभ का हस्त, मिथुन का स्वाति, कर्क का अनुराधा, सिंह का मूल, कन्या का श्रवण, तुला का शतभिषा, वृश्चिक का रेवती, धनु का भरणी, मकर का रोहिणी, कुम्भ का आर्द्रा और मीन का अश्लेषा.
प्रत्येक राशि को शुभ कार्य करते समय अपने घात नक्षत्र का त्याग करना चाहिए अन्यथा हानि और संकटों का सामना करना पड़ सकता है.

15. जन्म नक्षत्र – जन्म नक्षत्र और उसका दसवां तथा उन्नीसवां नक्षत्र जन्म नक्षत्र कहलाते हैं. शुभ कार्यों के लिए इनका निषेध कहा गया है वरना हानि होती है.