Category Archives: फूड

सोयाबीन एक अमानवीय भोजन

सोयाबीन को अत्यंत गुणकारी बताया जा रहा है.

निरंतर प्रचार किया जा रहा है की सोयाबीन मानव के लिए बहुत उपयोगी खाद्य है.
जबकि सच्चाई यह है की भारत कभी भी सोयाबीन नहीं खाता था. सोयाबीन के लिये भारतीय भाषाओँ में शब्द तक नहीं है. इसके पश्चिमी नाम सोय के एवज में भारतीय इसे सोया कहते हैं.

भारतीय मानस में सोयाबीन को इस कदर ठूंस दिया गया है की हैरत होती है.
सोया तेल , सोया दूध , सोया पनीर टोफू , सोया प्रोटीन , सोया क्रीम , सोया वड़ी , सोया चॉप , सोया चोकर. आज सोया का ऐसा कौन सा रूप है जो हम नहीं खा रहे.

कुछ कंपनियों ने तो कृत्रिम मांस के रूप में सोया उत्पाद मांस के विकल्प में उतार दिये हैं.

सोयाबीन का इतना गुणगान किया गया है की इसे हर मर्ज हर समस्या की दवा बता डाला है.

कैंसर रोगी हो या गर्भवती , मधुमेह हो या हृदय रोग सोयाबीन खाओ और मजे करो. और भी ना जाने कितनी बीमारियों और समस्याओं का समाधान सोयाबीन में खोज दिया है.

11MP_MEALMAKER1_1647875fलेकिन वास्तविकता इससे बिलकुल उलट है.
सोयाबीन को इसके पूर्ण रूप में पचा पाना इंसानी बूते के बाहर की बात है. ये इंसानी खुराक है ही नहीं. केवल हाड़ तोड़ श्रमिक ही इसे पूरा वो भी अत्यंत सीमित मात्रा में पचा सकता है.
सत्य तो यह है की पश्चिम में सोयाबीन सूअरों का भोजन है और इसका तेल पेंट और वार्निश बनाने के काम आता है…

सम्यक आहार

भगवान् धन्वंतरी को देवताओं का चिकित्सक और आयुर्वेद का प्रणेता माना जाता है.
उनके द्वारा दिया गया यह सूत्र स्वास्थ्य विज्ञान का बीज मंत्र है.
‘हित भुक , मित भुक , ऋत भुक’

हित भुक – जो हितकारी हो वही खाओ
मित भुक – थोड़ा खाओ
ऋत भुक – ऋतु के अनुसार खाओ

साथ इस पर भी विवाद नहीं है की जिस स्थान विशेष पर मनुष्य रहता है वहां के वातावरण में पैदा होने वाली शाक सब्जियों , फलों , अनाजों और अन्य वस्तुओं का सेवन करके व्यक्ति सदा स्वस्थ रह सकता है…1379907_564005210334020_681327986_n

च्यवनप्राश

सर्दियां शुरू होते ही भारतीय घरों में च्यवनप्राश का सेवन किया जाना आम बात है. 1382847_569330329801508_993115823_nशायद ही कोई ऐसा घर होगा जो टॉनिक के तौर पर च्यवनप्राश का सेवन ना करता हो.

च्यवनप्राश 54 प्रकार की जड़ी बूटियों से मिलकर बनने वाला फ़ॉर्मूला है.
इसमें अष्टवर्ग समूह की आठ हिमालयी जड़ी बूटियां जैसे की रिद्धि , वृद्धि , जीवक , ऋषभक , मेदा , महामेदा , काकोली और क्षीरकाकोली आधारभूत अतिआवश्यक घटक तत्व की भूमिका निभाती हैं.

लेकिन दुर्भाग्यवश अत्यधिक पर्वतीय दोहन और अनियंत्रित विकास की प्रक्रिया स्वरूप ये जड़ी बूटियां वर्षों पहले लुप्त हो चुकी हैं. यही नहीं बल्कि च्यवनप्राश में पड़ने वाली अन्य चौबीस प्रकार की जड़ी बूटियां भी लुप्तप्राय हैं.

ऐसे में कहा जा सकता है की च्यवनप्राश फ़ॉर्मूले की बरसों पहले मौत हो चुकी है.

लेकिन आज भी बाजार में च्यवनप्राश बिक रहा है…

आईस्क्रीम या फ्रोजन डेजर्ट

आपके परिवार ने आईसक्रीम खाने की इच्छा जाहिर की. आप बाजार गये और बढ़िया सी आईसक्रीम ले आये.
लेकिन आपको जान कर कैसा लगेगा की जिसे आप आईसक्रीम समझ रहे हैं वो आईसक्रीम है ही नहीं.

जी हां. यही सच्चाई है. देश में ज्यादातर आईसक्रीम निर्माता कम्पनियों द्वारा आईसक्रीम बनाई ही नहीं जाती.

1378518_569755899758951_1448107606_n

‘प्रिवेंशन ऑफ़ फ़ूड एडेलट्रेशन एक्ट 1954’ के अनुसार आईसक्रीम शब्द केवल उसी उत्पाद पर लिखा जा सकता है जिसमे एक निश्चित मात्र में डेयरी क्रीम और डेयरी बटर का समावेश हो.

लेकिन आईसक्रीम निर्माता लागत कम करने के लिए डेयरी क्रीम और बटर की जगह सस्ते पाम आयल से बनी मार्जरीन का इस्तेमाल करते हैं. ऐसे में इनके द्वारा निर्मित उत्पाद को ‘फ्रोजन डेजर्ट’ का नाम दिया जाता है. यही पैकिंग पर लिखा भी होता है. लेकिन आम आदमी को इसका पता ही नहीं.

अगली बार आप जब आईसक्रीम खरीदें तो देख लें की पैक पर आईसक्रीम लिखा है या फ्रोजन डेजर्ट…

पत्तल दोने

पलाश वृक्ष जिसे ढाक या टेसू भी कहते हैं अति उपयोगी वृक्ष है.
यह इतना सुंदर होता है की इसे जंगल की आग भी कहते हैं.

इस वृक्ष के पत्तों से पत्तल और दोने बनाये जाते हैं और इन्हें जोड़ने के लिये नीम की सींक का प्रयोग होता है.
इन पत्तल दोनों का व्यक्ति यदि रोजाना अपने घर पर उपयोग शुरू कर दे तो उसके जीवन में क्रांति हो जाये.
ये अद्भुत रूप से औषधीय गुणो से युक्त हैं. हमारे बुजुर्ग अति प्रज्ञावान थे. तभी उन्होंने इस वृक्ष की पत्तल को खाने के लिये चुना.

इन पत्तलों और दोनों में भोजन करने से अपच , पेट के कीड़े , वायु विकार , बवासीर , कब्ज , कफ विकार , खांसी और सभी प्रकार के प्रमेह दोष नष्ट हो जाते हैं.
इनका उपयोग पर्यावरण मैत्री की दिशा में उठाया गया अत्यधिक महत्वपूर्ण कदम साबित हो सकता है.
साथ ही बर्तन मांजने और डिश वॉशिंग बार के जहर से मुक्ति अलग…1461758_586251081442766_2052415235_n

मिर्च की लत

कुछ लोग बहुत तेज मिर्च खाते हैं.
कम मिर्च वाला भोजन उन्हें अस्पताल के खाने जैसा लगता है. उनका आग्रह होता है की व्यंजन चाहे जो भी हो तीखा होना चाहिए. उन्हें तीखे और चरपरेपन में ही रस है.
ऐसे लोग मिर्च के लती कहलाते हैं. इन्हें मिर्च खाने का नशा सा सवार रहता है.
अमेरिकन फार्मासिस्ट विल्बर स्कोविल ने सर्वप्रथम मिर्च के चरपरेपन को नापने की इकाई अविष्कृत की.
इसे उनके ही नाम स्कोविल से जाना जाता है.
शिमला मिर्च को जीरो स्कोविल माना जाता है. जबकि एक तीखी भारतीय मिर्च लोटा मिर्च या ततैय्या मिर्च 75000 स्कोविल मानी जाती है. इसे खाने के बाद जलन मिटाने के लिए एक लोटा पानी पीना पड़ता है. लेकिन मिर्च प्रेमी इसके दीवाने हैं.
कहा जाता है की विश्व की सर्वाधिक तीखी मिर्चों में से एक तीखी मिर्च मेक्सिको की हबानेरो है. यह 300000 स्कोविल आंकी जाती है. इसे खाने के बाद सिर चकरा जाता है और काफी देर तक कानो में बहरापन बना रहता है. 
लेकिन तीखेपन में ये मिर्च उत्तर पूर्व भारत में पाई जाने वाली भूत जोलोकिया मिर्च के सामने बच्चा है.
भूत जोलोकिया विश्व की सर्वाधिक चरपरी और खतरनाक मिर्च है. इसे 1000000 स्कोविल तक आंका गया है. यह मिर्च इतनी तीखी है की इसे शब्दों में बयान नहीं किया जा सकता.
कहा जाता है की एक हजार लोगों के लिए बने व्यंजन में चरपनेपन के लिए इस एक मिर्च को डालना काफी रहता है.
यदि कोई जोश में आकर इसका छोटा सा भी अंश खा लेता है तो उसकी हालत अस्पताल जाने जैसी हो जाती है.
मिर्च में कैप्सैसिन नामक रसायन होता है.
जब ये रसायन शरीर में जाता है तो शरीर का सचेतक तंत्र तुरंत मस्तिष्क को अत्यधिक जलन की खतरे की सूचना भेजता है. मस्तिष्क यह सूचना पाते ही एंडोर्फिन नामक जलन शामक तत्व का रिसाव शरीर में कर देता है.
एंडोर्फिन का रिसाव होते ही मनो मस्तिष्क में एक आह्लाद , खुमारी , प्रसन्नता और विश्राम का एहसास होता है.
यह बिलकुल ऐसा है जैसे थोड़ी सी अफीम या गांजे की मात्रा खा ली जाए.
यही है मिर्च का नशा.
ज्योतिष की दृष्टि से मंगल यदि पाप प्रभाव में हो तो जातक तेज मिर्च खाने का आदि होता है.
लाल किताब में इसे मंगल बद की संज्ञा दी गयी है. मंगल की यह स्थिति जातक का मिर्च में रुझान बढ़ा देती है…

941624_511356172265591_578457081_n