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गुरु पूर्णिमा 2016

आषाढ़ मास की पूर्णिमा को गुरु पूर्णिमा कहते हैं. इस दिन अपने गुरु की पूजा का विधान है.

गुरु पूर्णिमा वर्षा ऋतु के आरम्भ में आती है और इस दिन से चार महीने तक परिव्राजक साधु-सन्त एक ही स्थान पर रहकर भक्तों में ज्ञान वितरित करते हैं. ये चार महीने चौमासा कहलाते हैं और आवागमन के लिए अनुकूल नहीं होते. मौसम भी अच्छा होता है न अधिक गर्मी और न अधिक सर्दी. इसलिए अध्ययन के लिए यह उपयुक्त समय है. जैसे सूर्य के ताप से तप्त भूमि को वर्षा से शीतलता एवं फसल पैदा करने की शक्ति मिलती है, वैसे ही गुरु-चरणों में उपस्थित साधकों को ज्ञान, शान्ति, भक्ति और योग शक्ति प्राप्त करने की शक्ति मिलती है.

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यह दिन महाभारत के रचयिता कृष्ण द्वैपायन व्यास का जन्मदिन भी है. वे संस्कृत के प्रकांड विद्वान थे और उन्होंने चारों वेदों का संकलन किया था. इस कारण उनका एक नाम वेद व्यास है. उन्हें आदिगुरु कहा जाता है और उनके सम्मान में गुरु पूर्णिमा को व्यास पूर्णिमा नाम से भी जाना जाता है. भक्तिकाल के संत घीसादास का भी जन्म इसी दिन हुआ था वे कबीरदास जी के शिष्य थे.
शास्त्रों में ‘गु’ का अर्थ अंधकार या मूल अज्ञान और ‘रु’ का अर्थ दूर करने वाला किया गया है. गुरु को गुरु इसलिए कहा जाता है क्योंकि वह अज्ञान तिमिर का ज्ञान के प्रकाश से नाश कर देते हैं अर्थात अंधकार को हटाकर प्रकाश की ओर ले जाने वाले को ‘गुरु’ कहा जाता है. गुरु तथा देवता में समानता के लिए एक श्लोक में कहा गया है कि जैसी भक्ति की आवश्यकता देवता के लिए होती है वैसी ही गुरु के लिए भी. सद्गुरु की कृपा से ईश्वर का साक्षात्कार भी संभव है. गुरु की कृपा के अभाव में कुछ भी संभव नहीं है.
भारत वर्ष में गुरू पूर्णिमा का पर्व बड़ी श्रद्धा व धूमधाम से मनाया जाता है. प्राचीन काल में जब विद्यार्थी गुरु के आश्रम में निःशुल्क शिक्षा ग्रहण करता था तो इसी दिन श्रद्धा भाव से प्रेरित होकर अपने गुरु का पूजन करके उन्हें अपनी शक्ति सामर्थ्यानुसार दक्षिणा देकर कृत कृत्य होता था. पारंपरिक रूप से शिक्षा देने वाले विद्यालयों में, संगीत और कला के विद्यार्थियों में आज भी यह दिन गुरू को सम्मानित करने का होता है. मंदिरों में पूजा होती है, पवित्र नदियों में स्नान होते हैं, जगह जगह भंडारे होते हैं और मेले लगते हैं.
इस वर्ष यह पर्व 19 जुलाई को है.