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निर्जला एकादशी 2016

सनातन व्रतों और त्यौहारों में एकादशी व्रत महत्वपूर्ण स्थान रखता है. प्रत्येक वर्ष 24 एकादशियां होती हैं. जब अधिक मास या मल मास आता है तब इनकी संख्या बढ़कर 26 हो जाती है. ज्येष्ठ मास की शुक्ल पक्ष एकादशी को निर्जला एकादशी कहते है, इस व्रत मे पानी तक पीना वर्जित है इसीलिये यह निर्जला एकादशी कहलाती है.
इस व्रत को पांडव एकादशी या भीमसेनी एकादशी भी कहते हैं. पौराणिक मान्यता है की भूख पर नियंत्रण ना रख पाने वाले भीमसेन ने महर्षि व्यास के मार्गदर्शन अनुसार इस व्रत को रख पुण्य पाया था.
निर्जला एकादशी भगवान विष्णु की आराधना का पर्व है. इस दिन कलश, घड़ा, खरबूज, तरबूज, ककड़ी, शरबत, पंखा, छतरी, हलके सूती वस्त्र आदि वस्तुओं के दान का विधान है.
निर्जला एकादशी आत्म संयम का व्रत है. निर्जल रहकर दान पुण्य करते हुए ‘ॐ नमो भगवते वासुदेवाय’ का जप करना इस व्रत का विधान है. यह व्रत सभी व्रतों में श्रेष्ठ और पाप नाशक माना गया है. कहा गया है की इसे करने से समस्त एकादशियों का फल मनुष्य को प्राप्त हो जाता है.
इस वर्ष यह व्रत 16 जून को पड़ रहा है.

अणु और ऋणु

यह वह ज्योतिषीय अवस्थाएं हैं जिनके द्वारा मानव मन का संयोजन और विघटन औसत रूप में परिभाषित किया जा सकता है.
कालपुरुष की प्रथम राशि मेष अणु कहलाती है. इसका स्वामी मंगल है, यहां से मानव जीवन आरंभ होता है.

यूं तो कुंडली के प्रथम भाव का नैसर्गिक कारक सूर्य है जो की आत्मा का द्योतक है लेकिन कालपुरुष की प्रथम अभिव्यक्ति मंगल है. इसलिए स्पष्ट ही कहा जा सकता है आत्मा रुपी सूर्य की सांसारिक अभिव्यक्ति मंगल है.

मेष संयोजन और अभियान राशि है. इसे भूमि से अतिशय प्रेम है और बलवती होने पर प्रचुरता से अचल संपत्ति का निर्माण करती है. स्वभाव से यह क्षत्रिय है. मानवीय अहम, समस्त भौतिक अभियान, मारकाट, जमींदारी, लालसा और लोलुपता इसी का अधिकार क्षेत्र हैं. देवताओं के सेनापति भगवान कार्तिकेय इस राशि के अधिदेवता माने गए हैं. मेष का रंग चमकता लाल है.

इस राशि के साथ एक दुर्भावना भी जुड़ी है और वह है इसका विपरीत लिंगीय संबंध, इस मामले में यह दुर्भाग्यशाली राशि है. क्योंकि ऋणु राशि तुला इसके सप्तम भाव का प्रतिनिधित्व करती है.

ऋणु द्वारा वह संयोजन विघटित होता दिखता है जो अणु द्वारा संयोजित हुआ था. इसकी प्रतिनिधि राशि तुला और स्वामी शुक्र है.

हालांकि विघटन के संकेत पूर्व राशि कन्या से ही मिलने लगते हैं जो की आश्रितों के लिए निकम्मी राशि है. कन्या राशि अपने किसी भी उत्तरदाई को सुखद आश्वासन नहीं देती. इससे उम्मीद बांधना दुखों को निमंत्रण देता है.

तुला राशि सांसारिक अर्थों में सर्वाधिक दुर्भाग्यपूर्ण राशि है. मौज मारते दिखते हुए भी इसके जातक दुखों की सूली पर टंगे होते हैं. इनके जीवन से संघर्ष और तनाव मानो कभी विदा ही नहीं होते. जीवन में कभी भी ऐसा दिन नहीं आता जिसे यह सुखद कह आनंद मना सकें.

इसका कारण है मेष के अणु द्वारा संयोजित मन के तुला के ऋणु द्वारा विघटन की प्रक्रिया का आरंभ. मेष से कन्या तक संयोजन और तुला से मीन तक विघटन की गाथा है ज्योतिष.
जो बना है उसे मिटना भी है, यही जीवन है.

बलकटी स्त्रियां होती हैं दुर्भाग्यशाली

अनुभव में पाया गया है की लड़कों जैसे छोटे बाल रखने वाली स्त्रियां दुखी रहती हैं.

वे भले ही उच्च पदस्थ अथवा धनी हों उनके जीवन में सुख नहीं होता. खासतौर पर पति सुख या विपरीत लिंगी सुख. ऐसी स्त्रियों को पुरुषों के प्यार और सहानुभूति की तलाश में भटकते देखा जा सकता है. यदि वे विवाहित हैं तो पति से नहीं बनती और अलगाव की स्थिति बन जाती है और अधिकांश मामलों में पति से संबंध विच्छेद हो भी जाता है.

इसका कारण ज्योतिष में छिपा है. कालपुरुष कुंडली का सप्तम भाव शुक्र का भाव है. यहां शुक्र की मूलत्रिकोण राशि तुला विराजमान है. सप्तम भाव सौंदर्य और कला का भाव है, साथ ही यह विपरीत लिंगी और जीवनसाथी का भी प्रतिनिधित्व करता है.

शुक्र सौंदर्य, भोग विलास और प्रसन्नता का कारक ग्रह है. लंबे और सुंदर केश स्त्रियों का आधारभूत सौंदर्य हैं, इनके बाद ही सौंदर्य की अन्य उपमाओं का नंबर आता है. जब स्त्री द्वारा अपने केशों को कटवा कर छोटा कर लिया जाता है तो शुक्र बुरी तरह पीड़ित हो जाता है और अशुभ परिणाम देने लगता है.

हिन्दू समाज में किसी की मृत्योपरांत पारिवारिक सदस्यों का मुंडन और किसी सन्यासी परंपरा के अनुसरण द्वारा पुरुषों का गंजा रहना भी इसी सत्य को प्रतिपादित करता है. यह भी शुक्र को निर्बल करने की प्रक्रिया है.

शनि शिंगणापुर स्त्रियों द्वारा तैलार्पण निषेध के कारण

स्त्रियों द्वारा शनि शिंगणापुर में शनिदेव को तैलार्पण निषेध के पीछे गहरा राज छिपा है जो स्त्रियों के ही हित में है.

सभी सनातन मान्यताएं अपने में गहन अर्थ लिए हैं भले ही आज उनके अर्थ विस्मृत हो गए हों और यह परंपरा भी इससे अछूती नहीं है.

शनि पाप ग्रह और ब्रह्माण्डीय न्यायाधीश है. शनि वैराग्य का कारक है. इससे प्रभावित व्यक्ति सांसारिक मोह से विमुक्त हो वैराग्य धारण करता है. इसकी दृष्टि अधो है जिसका अर्थ है की यह अपनी प्रचण्ड वैराग्यात्मक ऊर्जा को सतत पृथ्वी में निसृत करता रहता है.

परमात्मा की नवग्रह शक्ति वितरण व्यवस्था में शनि का मुख्य कार्य जीव को उसके कर्मों का फल प्रदान कर निर्मल करना है. मन के संयोजक मंगल के विपरीत यह मन को विखंडित करने की प्रक्रिया का कारक है.

शनि वायु का कारक और लिंग में नपुंसक है. वायु का प्रभाव वैचारिक भटकाव की आशंका उत्पन्न करता है.

शनि तैलार्पण शनि से उत्सर्जित हो रही वैराग्यात्मक ऊर्जा का बृहस्पति (तेल) द्वारा शमन है. पुरुषों को अनुमति है की वे अपना कुछ बृहस्पति अंश (धन एवं ज्ञान) इस प्रक्रिया हेतु व्यय कर सकते हैं.

लेकिन सनातन व्यवस्था स्त्रियों को इसकी अनुमति कदापि नहीं देती. स्त्रियों की प्रकृति पृथ्वी के समान ग्राहीय है और उन पर जन्म की महत् जिम्मेदारी है. उनके लिए वैराग्य की अपेक्षा भक्ति पर जोर दिया गया है.

भगवान श्रीकृष्ण द्वारा भी स्त्रियों के लिए संन्यास की बजाय भक्ति धारा निर्मित करने के प्रयास हुए.

सनातन दर्शन स्त्रियों को बृहस्पति अंश व्यय की बिलकुल अनुमति नहीं देता क्योंकि बृहस्पति स्त्रियों की कुंडली में पति, संतान (विशेषतया पुत्र), विनम्रता और बुजुर्गों के सम्मान का कारक है. शनि तैलार्पण से उनके पति और संतान को भय हो सकता है, साथ ही उनके स्वभाव का आधारभूत गुण विनम्रता उदंडता में परिवर्तित हो सकता है जो की परिवार और समाज के बिखराव का कारण होगा.

शंभल

हिन्दू और बौद्ध मान्यताओं में शंभल एक पवित्र स्थान है.

विष्णु पुराण के अनुसार दशम अवतार शंभल में जन्म लेगा. ऐसे ही बौद्धों के एक ग्रंथ कालचक्र तंत्र में कहा गया है की शंभल में मैत्रेय नाम से बुद्ध का अवतार होगा जो मलेच्छों का नाश करेगा.

इसे एशिया में कहीं छिपा माना गया है लेकिन कहां किसी को नहीं पता. कोई इसे हिमालय में तो कोई चीन में स्थित मानता है. रूस से भारत आकर बस गये महान चित्रकार निकोलाई रोरिक शंभल को दुर्गम हिमालय क्षेत्रों में जीवन भर खोजते रहे पर असफल रहे.
कल्कि पुराण में दशम अवतार कल्कि की माता सुमति (सद्बुद्धि), पिता विष्णुयश (पालन तत्व) और जन्मस्थान शंभल (पवित्र भूमि) बताया गया है. कल्कि की दो पत्नियां पद्मा (कमल विराजित) और रमा (संहारिणी शक्ति) हैं. कल्कि पुराणानुसार बाल्यवस्था में कल्कि का विवाह त्रिकुटा नामक कन्या से भी हुआ था लेकिन त्रिकुटा कभी कल्कि के साथ नहीं रहीं. पौराणिक मान्यता अनुसार माता वैष्णोदेवी ही त्रिकुटा हैं.

आश्चर्यजनक रूप से कल्कि अवतार के बारे में अनेक भविष्यवाणियां करने वाले त्रिकालज्ञ संत मावजी महाराज ‘क्षेत्र साबला, पुरी पाटन ग्राम’ का उद्घोष करते हैं. यह साबला और कुछ नहीं शंभल का ही अपभ्रंश है. ईसवी सन 745 में राजा वनराज चावड़ा ने पाटन की स्थापना की.
महाभारत काल में यह प्रदेश अनर्त कहलाता था जो की प्रसिद्द योद्धा सात्यकि और कृतवर्मा का घर था. यह दोनों योद्धा और अन्य अनर्त वीर पांडवों और कौरवों की तरफ से महाभारत युद्ध में लड़े थे. अनर्त गुजरात के काठियावाड़ का उत्तरी इलाका पाटन ही है.
प्राचीन पाटन का ह्रदय स्थल है वाडनगर जिसका इतिहास आज से 4500 वर्ष पीछे तक जाता है. इस स्थान की ऐतिहासिकता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है की वर्तमान में यह शहर एक एक टीले नुमा संरचना पर बसा हुआ है जो की और कुछ नहीं एक के ऊपर एक बसी सभ्यताएं हैं.
वेदों में वर्णित महान ऋषि याज्ञवल्कय जो की शास्त्रार्थ में अजेय थे का घर चमत्कारपुर भी यही क्षेत्र है. बृहदारण्यक उपनिषद में ऋषि याज्ञवल्कय का विस्तार से वर्णन है.
सांतवीं सदी में चीन से भारत आये चीनी यात्री ह्युन्सांग का आनंदपुर भी वाडनगर ही है, आज इस बात के ठोस पुरातात्विक साक्ष्य मौजूद हैं.
हड़प्पा, सनातन, रोमन, बौद्ध, और जैन संस्कृति को स्वयं में समेटे अतीत में मंदिरों का शहर वाडनगर इतना पवित्र माना जाता था की धर्म, कला और संस्कृति के पिपासुओं के आकर्षण का केंद्र था…