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कुयोग या दुर्योग

कुयोग या दुर्योग वे योग हैं जिनमे आरम्भ किये गए कार्यों में असफलता और निराशा हाथ लगती है. इन योगों में आरम्भ अथवा प्रतिष्ठित किये गए कार्यों का प्रतिफल हानि, संकट और कष्ट के रूप में सामने आता है. कई बार तो व्यक्ति इन योगों के फलस्वरूप मृत्युतुल्य कष्ट पाता है या फिर उसकी मृत्यु ही हो जाती है.
कुयोग या दुर्योग इस प्रकार से बनते हैं –

1. कालदण्ड – रविवार को यदि भरणी, सोमवार को आर्द्रा, मंगलवार को मघा, बुधवार को चित्रा, गुरूवार को ज्येष्ठा, शुक्रवार को अभिजित और शनिवार को पूर्वाभाद्रपद नक्षत्र हो तो यह कुयोग बनता है. इसके परिणाम स्वरुप मृत्युतुल्य कष्ट की संभावना होती है.

2. वज्र – रविवार को यदि आश्लेषा, सोमवार को हस्त, मंगलवार को अनुराधा, बुधवार को उत्तराषाढ़ा, गुरूवार को शतभिषा, शुक्रवार को अश्विनी और शनिवार को मृगशिरा नक्षत्र हो तो यह योग बनता है. इसके परिणामस्वरूप हानि की संभावना होती है.

3. लुम्बक – रविवार को स्वाति, सोमवार को मूल, मंगलवार को श्रवण, बुधवार को उत्तराभाद्रपद, गुरूवार को कृतिका, शुक्रवार को पुनर्वसु और शनिवार को पूर्वाफाल्गुनी नक्षत्र हो तो यह योग होता है. इसके परिणामस्वरूप धनहानि की संभावना होती है.

4. उत्पात – रविवार को विशाखा, सोमवार को पूर्वाषाढ़ा, मंगलवार को धनिष्ठा, बुधवार को रेवती, गुरूवार को रोहिणी, शुक्रवार को पुष्य और शनिवार को उत्तराफाल्गुनी नक्षत्र हो तो यह योग होता है. इसके परिणामस्वरूप प्राणों को भय रहता है.

5. मृत्यु – रविवार को अनुराधा, सोमवार को उत्तराषाढ़ा, मंगलवार को शतभिषा, बुधवार को अश्विनी, गुरूवार को मृगशिरा, शुक्रवार को आश्लेषा और शनिवार को हस्त नक्षत्र हो तो यह योग होता है. इसके परिणामस्वरूप मृत्यु की आशंका रहती है.

6. काण – रविवार को ज्येष्ठा, सोमवार को अभिजित, मंगलवार को पूर्वाभाद्रपद, बुधवार को भरणी, गुरूवार को आर्द्रा, शुक्रवार को मघा और शनिवार को चित्रा नक्षत्र हो तो यह योग होता है. इसके परिणामस्वरूप क्लेश की आशंका होती है.

7. मूसल – रविवार को अभिजित, सोमवार को पूर्वाभाद्रपद, मंगलवार को भरणी, बुधवार को आर्द्रा, गुरूवार को मघा, शुक्रवार को चित्रा और शनिवार को ज्येष्ठा नक्षत्र हो तो यह योग होता है. इसके परिणामस्वरूप धनहानि की सम्भावना होती है.

8. गदा – रविवार को श्रवण, सोमवार को उत्तराभाद्रपद, मंगलवार को कृतिका, बुधवार को पुनर्वसु, गुरूवार को पूर्वाफाल्गुनी, शुक्रवार को स्वाति और शनिवार को मूल नक्षत्र हो तो यह योग होता है. इसके परिणामस्वरूप रोग की सम्भावना रहती है.

9. रक्ष – रविवार को शतभिषा, सोमवार को अश्विनी, मंगलवार को मृगशिरा, बुधवार को अश्लेषा, गुरूवार को हस्त, शुक्रवार को अनुराधा और शनिवार को उत्तराषाढ़ा नक्षत्र हो तो यह नक्षत्र होता है. इसके परिणामस्वरूप महाकष्ट की सम्भावना होती है.

10. यमदंष्ट्र – रविवार को मघा, धनिष्ठा सोमवार को विशाखा, मूल मंगलवार को भरणी, कृतिका बुधवार को पुनर्वसु, रेवती गुरूवार को अश्विनी, उत्तराषाढ़ा शुक्रवार को रोहिणी, अनुराधा और शनिवार को श्रवण या शतभिषा नक्षत्र हो तो यह योग होता है. इस योग में कार्य करने से असफलता प्राप्त होती है.

11. यमघण्ट – रविवार को मघा, सोमवार को विशाखा, मंगलवार को आर्द्रा, बुधवार को मूल, गुरूवार को कृतिका, शुक्रवार को रोहिणी और शनिवार को हस्त नक्षत्र हो तो यह योग होता है. इस योग को शुभकार्यों और यात्रा के लिए निषिद्ध माना गया है.

12. ज्वालामुखी – जैसा की नाम से ही स्पष्ट है यह एक खतरनाक योग है. इसकी भी मूल की ही भांति शांति कराई जाती है. प्रतिपदा तिथि को मूल, पंचमी को भरणी, षष्ठी को कृतिका, नवमी को रोहिणी और दशमी को आश्लेषा नक्षत्र हो तो यह योग होता है. इसमें समस्त शुभ कार्य वर्जित हैं.

13. दग्ध नक्षत्र – रविवार को भरणी, सोमवार को चित्रा, मंगलवार को उत्तराषाढ़ा, बुधवार को धनिष्ठा, गुरूवार को उत्तराफाल्गुनी, शुक्रवार को ज्येष्ठा और शनिवार को रेवती नक्षत्र हो तो नक्षत्र दग्ध हो जाता है. दग्ध नक्षत्र किसी भी शुभ कार्य के लिए निषिद्ध होता है.

14. घात नक्षत्र – प्रत्येक राशि का एक घात नक्षत्र होता है. जैसे की मेष का मघा, वृषभ का हस्त, मिथुन का स्वाति, कर्क का अनुराधा, सिंह का मूल, कन्या का श्रवण, तुला का शतभिषा, वृश्चिक का रेवती, धनु का भरणी, मकर का रोहिणी, कुम्भ का आर्द्रा और मीन का अश्लेषा.
प्रत्येक राशि को शुभ कार्य करते समय अपने घात नक्षत्र का त्याग करना चाहिए अन्यथा हानि और संकटों का सामना करना पड़ सकता है.

15. जन्म नक्षत्र – जन्म नक्षत्र और उसका दसवां तथा उन्नीसवां नक्षत्र जन्म नक्षत्र कहलाते हैं. शुभ कार्यों के लिए इनका निषेध कहा गया है वरना हानि होती है.

शुभ ज्योतिषीय योग

सिद्धि योग, अमृत सिद्धि योग, सर्वार्थ सिद्धि योग और दैनंदिन वार और नक्षत्रों के संयोग से पड़ने वाले ज्योतिषीय योगों के अलावा भी कुछ शुभ योग होते हैं. यह योग इस प्रकार से हैं –

कुमार योग – प्रतिपदा, पंचमी, षष्ठी, दशमी या एकादशी तिथि हो, सोमवार, मंगलवार, बुधवार या शुक्रवार हो, अश्विनी, रोहिणी, पुनर्वसु, मघा, हस्त, विशाखा, मूल, श्रवण या पूर्वाभाद्रपद नक्षत्र हों.
शिक्षा आरम्भ, गृह प्रवेश और प्रतिष्ठान आदि के मुहूर्त के लिए यह शुभ योग है.

राजयोग – द्वितीया, तृतीया, सप्तमी, द्वादशी या पूर्णिमा तिथि हों, रविवार, मंगलवार, बुधवार या शुक्रवार हों, भरणी, मृगशिरा, पुष्य, पूर्वाफाल्गुनी, चित्रा, अनुराधा, पूर्वाषाढ़ा, धनिष्ठा या उत्तराभाद्रपद नक्षत्र हों.
समस्त मांगलिक और धार्मिक कार्यों के लिए यह बहुत शुभ योग हैं.

गुरु पुष्य योग – गुरूवार को यदि पुष्य नक्षत्र हो तो यह योग फलित होता है. शिक्षा आरम्भ, गृहप्रवेश, व्यापार आरम्भ आदि के लिए यह बहुत शुभ योग है.

रवि पुष्य योग – रविवार को यदि पुष्य नक्षत्र हो तो यह योग फलित होता है. साधना, ज्योतिषीय उपाय, दरिद्रतानाशक उपाय आदि के लिए यह अत्यंत श्रेष्ठ योग है.

पुष्कर योग – यह अत्यंत दुर्लभ योग है. सूर्य विशाखा नक्षत्र में और चंद्रमा कृतिका नक्षत्र में हो तो यह योग फलित होता है. यह अतिश्रेष्ठ शुभ योग है.

रवि योग – यह अत्यंत शक्तिशाली योग है. सूर्य अधिष्ठित नक्षत्र से चौथे, छठे, दसवें, तेरहवें अथवा बीसवें नक्षत्र में यदि चंद्रमा हो तो रवि योग होता है. इस योग की विशेषता है की यह समस्त प्रकार के कुयोगों को नष्ट कर देता है. यदि जातक को पत्रिका के किसी कुयोग के कारण सफलता में संदेह हो तो वह रवि योग में कार्य संपन्न कर सफलता पा सकता है.

सर्वार्थ सिद्धि योग

सर्वार्थ सिद्धि योग वे योग हैं जिनमे सर्व कार्यों में सफलता प्राप्त होती है. यह योग अत्यंत श्रेष्ठ होता है. परन्तु दुष्ट तिथि पड़ जाने पर सर्वार्थ सिद्धि योग निष्फल हो जाता है.
सर्वार्थ सिद्धि योग इस प्रकार बनते हैं –

1. रविवार को अश्विनी, पुष्य, उत्तराफाल्गुनी, हस्त, मूल, उत्तराषाढ़ा या उत्तराभाद्रपद नक्षत्र हों. लेकिन प्रतिपदा या तृतीया तिथि होने पर योग निष्फल हो जाता है.
2. सोमवार को रोहिणी, मृगशिरा, पुष्य, अनुराधा या श्रवण नक्षत्र हों. लेकिन द्वितीया या एकादशी तिथि होने पर योग निष्फल हो जाता है.
3. मंगलवार को अश्विनी, कृतिका, आश्लेषा या उत्तराभाद्रपद नक्षत्र हों. लेकिन तृतीया, नवमी या द्वादशी तिथि होने पर योग निष्फल हो जाता है.
4. बुधवार को कृतिका, रोहिणी, मृगशिरा, हस्त या अनुराधा नक्षत्र हों. लेकिन सप्तमी, नवमी या एकादशी तिथि होने पर योग निष्फल हो जाता है.
5. गुरूवार को अश्विनी, पुनर्वसु, पुष्य, अनुराधा या रेवती नक्षत्र हों. यह सभी तिथियों पर फलीभूत होता है.
6. शुक्रवार को अश्विनी, पुनर्वसु, अनुराधा, श्रवण या रेवती नक्षत्र हों. यह सभी तिथियों पर फलीभूत होता है.
7. शनिवार को रोहिणी, स्वाति या श्रवण नक्षत्र हों. एकादशी या त्रियोदशी तिथि होने पर योग निष्फल हो जाता है.

अमृत सिद्धि योग

अमृत सिद्धि योग वे उत्तम योग हैं जिनमे किये जाने वाले कार्यों में सफलता प्राप्त होती है. परन्तु इस दिन यदि दुष्ट तिथि पड़ जाए तो यह योग नष्ट होकर विष योग बन जाता है जिसे त्रितयत कहते हैं.
यह योग इस प्रकार बनते हैं –

1. रविवार को हस्त नक्षत्र हो तो अमृत सिद्धि योग परन्तु पंचमी तिथि पड़ जाए तो विष योग.
2. सोमवार को मृगशिरा नक्षत्र हो तो अमृत सिद्धि योग परन्तु षष्टी तिथि पड़ जाए तो विष योग.
3. मंगलवार को अश्विनी नक्षत्र हो तो अमृत सिद्धि योग परन्तु सप्तमी तिथि पड़ जाए तो विष योग.
4. बुधवार को अनुराधा नक्षत्र हो तो अमृत सिद्धि योग परन्तु अष्टमी तिथि पड़ जाए तो विष योग.
5. गुरूवार को पुष्य नक्षत्र हो तो अमृत सिद्धि योग परन्तु नवमी तिथि पड़ जाए तो विष योग.
6. शुक्रवार को रेवती नक्षत्र हो तो अमृत सिद्धि योग परन्तु दशमी तिथि पड़ जाए तो विष योग.
7. शनिवार को रोहिणी नक्षत्र हो तो अमृत सिद्धि योग परन्तु एकादशी तिथि पड़ जाए तो विष योग.

सिद्धि योग

सिद्धि योग वे शुभ योग हैं जिनमे किये जाने वाले किसी नवीन कार्य में सफलता प्राप्त होती है.
यह निम्न प्रकार से बनते हैं –

1. रविवार को अष्टमी तिथि तथा अश्विनी, पुष्य, उत्तराफाल्गुनी, हस्त, मूल, उत्तराषाढ़ा, धनिष्ठा और उत्तराभाद्रपद नक्षत्र हों.
2. सोमवार को नवमी या दशमी तिथि तथा रोहिणी, मृगशिरा, पुष्य, श्रवण और शतभिषा नक्षत्र हों.
3. मंगलवार को तृतीया, अष्टमी या त्रियोदशी तिथि तथा अश्विनी, मृगशिरा, आश्लेषा, मूल और उत्तराभाद्रपद नक्षत्र हों.
4. बुधवार को द्वितीया, सप्तमी या द्वादशी तिथि तथा कृतिका, रोहिणी, मृगशिरा और अनुराधा नक्षत्र हों.
5. गुरूवार को पंचमी, दशमी या पूर्णिमा तिथि तथा अश्विनी, पुनर्वसु, पुष्य, विशाखा, अनुराधा और रेवती नक्षत्र हों.
6. शुक्रवार को प्रतिपदा, षष्टी या एकादशी तिथि तथा अश्विनी, पुनर्वसु, चित्रा, श्रवण, पूर्वाभाद्रपद और रेवती नक्षत्र हों.
7. शनिवार को चतुर्थी, नवमी या चतुर्दशी तिथि तथा रोहिणी, मघा, पूर्वाफाल्गुनी, स्वाति और श्रवण नक्षत्र हों.

विंशोत्तरी दशा तालिका

जन्म नक्षत्र महादशानाथ दशा वर्ष
कृतिका, उत्तराफाल्गुनी, उत्तराषाढ़ा सूर्य 6
रोहिणी, हस्त, श्रवण चन्द्र 10
मृगशिरा, चित्रा, धनिष्ठा मंगल 7
आर्द्रा, स्वाति, शतभिषा राहु 18
पुनर्वसु, विशाखा, पूर्वाभाद्रपद बृहस्पति 16
पुष्य, अनुराधा, उत्तराभाद्रपद शनि 19
आश्लेषा, ज्येष्ठा, रेवती बुध 17
मघा, मूल, अश्विनी केतु 7
पूर्वाफाल्गुनी, पूर्वाषाढ़ा, भरणी शुक्र 20

भगवद्कृपा के ज्योतिषीय योग

 

भगवद्कृपा के लिए मुख्यतया दशमेश, लग्नेश, द्वितीयेश, पंचमेश और नवमेश को उत्तरदायी माना जाता है.

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कुछ ऐसे ग्रहीय समीकरण हैं जिनसे सरलता से जाना जा सकता है की जातक पर कितनी ईश्वरीय कृपा है.
दशमेश यदि बुध हो और उस पर बृहस्पति या अन्य किसी शुभ ग्रह की दृष्टि पड़ती हो या दशम भावस्थ बुध की राशि में बृहस्पति विराजमान हों तो जातक ईश्वरीय कृपा का पात्र होता है. ईश्वर ऐसे जातक को दुखी नहीं होने देते.
नवमेश यदि उच्च का हो और उसपर शुभ ग्रहों की दृष्टि हो या द्वितीयेश, पंचमेश और नवमेश उससे युति करते हों तो जातक पर सदा प्रभुकृपा बनी रहती है.
लग्नेश से पंचमेष की युति अथवा दृष्टि संबंध ईश्वरीय कृपा का परिचायक है.
दशमेश लग्न अथवा चंद्र से केंद्र में हो साथ में नवमेश उच्च का हो तो व्यक्ति पर अखंड भगवद्कृपा होती है.
लग्नेश उच्च हो और शुभ ग्रहों से युत अथवा दृष्ट हो तो ईश्वरीय कृपा का प्रबल आश्वासन देता है.
द्वितीयेश पंचमस्थ हो साथ ही लग्नेश भी बली हो या उच्च के अथवा पंचमस्थ द्वितीयेश का संबंध बृहस्पति या केतु से हो तो जातक पर निश्चित ही ईश्वरीय कृपा बरसती रहती है.

होली 2016

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होली वसंत ऋतु में मनाया जाने वाला एक महत्वपूर्ण भारतीय त्यौहार है. यह पर्व हिंदू पंचांग के अनुसार फाल्गुन मास की पूर्णिमा को मनाया जाता है. रंगों का त्यौहार कहा जाने वाला यह पर्व पारंपरिक रूप से दो दिन भारत, नेपाल तथा कई अन्य देशों जिनमें अल्पसंख्यक हिन्दू लोग रहते हैं धूम धाम से मनाया जाता हैं. पहले दिन होली जलायी जाती है, जिसे होलिका दहन कहते है. दूसरे दिन रंग खेला जाता है जिसे धुलेंडी, धुरखेल और धूलिवंदन कहा जाता है. लोग एक दूसरे पर रंग, अबीर, गुलाल इत्यादि फेंकते हैं, ढोल बजा कर हंसी मजाक, नाच और गीत गाये जाते हैं और घर-घर जा कर लोगों को रंग लगाया जाता है. होली के दिन लोग पुरानी कटुता को भूल गले मिल फिर से दोस्त बन जाते हैं. एक दूसरे को रंगने और गाने-बजाने का दौर दोपहर तक चलता है, इसके बाद स्नान और विश्राम कर नए कपड़े पहन लोग एक दूसरे के घर मिलने जाते हैं, गले मिलते हैं और मिठाइयां खाते खिलाते हैं.
भारत के विभिन्न प्रांतो में होली के अनेकों रूप हैं. इनमे ब्रज की लट्ठमार होली बहुत प्रसिद्द है. भांग की ठंडाई, कांजी वड़ा और गुंझिया इस त्यौहार के मुख्य व्यंजन हैं. इस वर्ष यह त्यौहार 23/24 मार्च को मनाया जा रहा है.

बुध महादशा

Budh yantraबुध महादशा आरंभ होने वाली हो तो सतर्क हो जाएं.

बुध में धैर्य नहीं है और यह सर्वाधिक चंचल ग्रह है. ज्योतिष में इसे कुमार कहा गया है. जैसा की होता ही है महादशा परिवर्तन पर व्यक्ति के जीवन में परिवर्तन आता है और व्यापक उलटफेर होते हैं. बुध महादशा में घटनाक्रम तेजी से घटने लगता है, कई बार यह इतना तेज होता है की व्यक्ति घट रहे घटनाक्रम के साथ दौड़ नहीं पाता और चीजें नियंत्रण से बाहर हो जाती हैं. ऐसा बुध महादशा में बुध के अंतर पर ही अधिक होता है.

इसलिए बुध महादशा से या उसके तुरंत पूर्व की योजनाओं और परिवर्तनों पर भली भांति विचार कर लिया जाए. बुध यदि अशुभ परिणाम देने वाला होगा तो इतना तेजी से नुक्सान या अशुभ करेगा की आप हक्के बक्के रह जायेंगे. आपको समझ ही नहीं आएगा की यह सब इतना तेजी से कैसे हो गया. आप खुद को बुरी तरह फंसा पाएंगे, और यदि शुभ परिणामकारी होगा तो इतनी तेजी से खुशियां देने लगेगा की आप तनावग्रस्त हो जाओगे. पुराणों में इसे उत्पाती कहा गया है, उत्पात करना इसका स्वभाव है…

नवग्रह पीड़ाहर स्तोत्र

ग्रहाणामादिरादित्यो    लोकरक्षणकारक: । विषमस्थानसम्भूतां पीडां  हरतु मे  रवि: ॥
रोहणीश: सुधामूर्ति: सुधागात्र: सुधाशन: । विषमस्थानसम्भूतां पीडां हरतु  मे विधु: ॥
भूमिपुत्रो  महातेजा  जगतां  भयकृत् सदा । वृष्टिकृद् वृष्टिहर्ता च पीडां हरतु मे कुज: ॥
उत्पातरूपो  जगतां  चंद्रपुत्रो   महाद्युति: । सूर्यप्रियकरो  विद्वान पीडां हरतु मे बुध: ॥
देवमंत्री  विशालाक्ष:  सदा लोकहिते  रत: । अनेकशिष्यसंपूर्ण:  पीडां   हरतु  मे  गुरु: ॥
दैत्यमंत्री  गुरुस्तेषां  प्राणदश्च   महामति । प्रभु: ताराग्रहणां  च  पीडां  हरतु  मे भृगु: ॥
सूर्योपुत्रो  दीर्घदेहा  विशालाक्ष: शिवप्रिय: । मंदचार: प्रसन्नात्मा पीडां हरतु  मे शनि: ॥
अनेकरूपवर्णैश्च  शतशोsध    सहस्त्रदृक् । उत्पातरूपो  जगतां  पीडां  हरतु  मे  तम: ॥
महाशिरा  महावक्त्रो  दीर्घदंष्ट्रो  महाबल: । अतनुश्चोधर्वकेशश्च पीडां हरतु मे शिखि: ॥

अर्थ –
1. ग्रहों में प्रथम, अदिति के पुत्र, विश्व की रक्षा करने वाले भगवान् सूर्य विषमस्थानजनित मेरी पीड़ा का हरण करें.
2. दक्षकन्या नक्षत्ररूपा देवी रोहिणी के स्वामी, अमृतमय स्वरुपवाले, अमृतरूपी शरीरवाले, अमृत का पान कराने वाले चंद्रदेव विषमस्थानजनित मेरी पीड़ा को दूर करें.
3. भूमिपुत्र, महातेजस्वी, जगत को भयभीत करने वाले, वृष्टि कराने वाले, वृष्टि का हरण करने वाले मंगल मेरी पीड़ा का हरण करें.
4. जगत में उत्पात करने वाले, बिजली सी चमकवाले, सूर्यप्रिय, विद्वान, चंद्रमा के पुत्र बुध मेरी पीड़ा का निवारण करें.
5. देवताओं के मंत्री, सर्वदा लोककल्याण में निरत रहने वाले, विशाल नेत्रों वाले, अनेक शिष्यों से पूर्ण बृहस्पति मेरी पीड़ा दूर करें.
6. दैत्यों के मंत्री और गुरु, जीवनदान देने वाले, ताराग्रहों के स्वामी, महाबुद्धिमान शुक्र मेरी पीड़ा दूर करें.
7. सूर्यपुत्र, विशाल नेत्र और दीर्घ देहवाले, मंदगामी, भगवान शिव के प्रिय, प्रसन्नात्मा शनि मेरी पीड़ा दूर करें.
8. विविध रूप और वर्णवाले, सैंकड़ों हजारों नेत्रवाले, उत्पातरूप, अंधकारमय राहु मेरी पीड़ा दूर करें.
9. महाशीर्षस्थ, विशाल मुखवाले, बड़े दांतोंवाले, महाबली, बिना शरीरवाले, ऊर्ध्वकेशी, शिखास्वरूप केतु मेरी पीड़ा दूर करें.