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महाशिवरात्रि 2016

फाल्गुन मास की कृष्ण त्रियोदशी महाशिवरात्रि कहलाती है.

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मान्यता है की इसी दिन भगवान शिव का उद्भव हुआ था और इसी दिन प्रलय के समय प्रदोषकाल में भगवान शिव तांडव करते हुए अपनी त्रिनेत्र दृष्टि से सृष्टि को भस्म कर डालते हैं. इसी दिन भगवान शिव का मां गौरां से विवाह हुआ था.
महाशिवरात्रि हिन्दुओं का एक प्रमुख त्यौहार है. इस दिन रुद्राभिकेष, उपवास और रात्रि जागरण का विशेष महत्व है.

इस वर्ष महाशिवरात्रि पर्व 7 मार्च को मनाया जायेगा.

जन्म नक्षत्रानुसार तारा चक्र तालिका

एक नक्षत्र से दूसरे नक्षत्र तक की संख्या को तारा कहते हैं. यह संख्या 9 आवृत्तियों में विभाजित हैं. प्रत्येक नक्षत्र का अन्यों नक्षत्रों से समता, मैत्री, विपदा, शत्रु, क्षेम आदि संबंध होता हैं. दो लोगों के परस्पर संबंधों में इसका बहुत ही महत्वपूर्ण योगदान है. अपने जन्म नक्षत्र का अन्य नक्षत्र से संबंध देख व्यक्ति भावी परिणाम का आकलन कर सकता है.

तारा
जन्म नक्षत्र
1 जन्म 2 संपत 3 विपत 4 क्षेम 5 प्रत्यरि 6 साधक 7 वध 8 मित्र 9 अतिमित्र
1
अश्विनी
1 अश्विनी
10 मघा
19 मूल
2 भरणी
11पूर्वाफाल्गुनी
20 पूर्वाषाढ़ा
3 कृतिका
12 उत्तराफाल्गुनी
21 उत्तराषाढ़ा
4 रोहिणी
13 हस्त
22 श्रवण
5 मृगशिरा
14 चित्रा
23 धनिष्ठा
6 आर्द्रा
15 स्वाति
24 शतभिषा
7 पुनर्वसु
16 विशाखा
25 पूर्वाभाद्रपद
8 पुष्य
17 अनुराधा
26 उत्तराभाद्रपद
9 आश्लेषा
18 ज्येष्ठा
27 रेवती
2
भरणी
2 भरणी
11पूर्वाफाल्गुनी
20 पूर्वाषाढ़ा
3 कृतिका
12 उत्तराफाल्गुनी
21 उत्तराषाढ़ा
4 रोहिणी
13 हस्त
22 श्रवण
5 मृगशिरा
14 चित्रा
23 धनिष्ठा
6 आर्द्रा
15 स्वाति
24 शतभिषा
7 पुनर्वसु
16 विशाखा
25 पूर्वाभाद्रपद
8 पुष्य
17 अनुराधा
26 उत्तराभाद्रपद
9 आश्लेषा
18 ज्येष्ठा
27 रेवती
1 अश्विनी
10 मघा
19 मूल
3
कृतिका
3 कृतिका
12 उत्तराफाल्गुनी
21 उत्तराषाढ़ा
4 रोहिणी
13 हस्त
22 श्रवण
5 मृगशिरा
14 चित्रा
23 धनिष्ठा
6 आर्द्रा
15 स्वाति
24 शतभिषा
7 पुनर्वसु
16 विशाखा
25 पूर्वाभाद्रपद
8 पुष्य
17 अनुराधा
26 उत्तराभाद्रपद
9 आश्लेषा
18 ज्येष्ठा
27 रेवती
1 अश्विनी
10 मघा
19 मूल
2 भरणी
11पूर्वाफाल्गुनी
20 पूर्वाषाढ़ा
4
रोहिणी
4 रोहिणी
13 हस्त
22 श्रवण
5 मृगशिरा
14 चित्रा
23 धनिष्ठा
6 आर्द्रा
15 स्वाति
24 शतभिषा
7 पुनर्वसु
16 विशाखा
25 पूर्वाभाद्रपद
8 पुष्य
17 अनुराधा
26 उत्तराभाद्रपद
9 आश्लेषा
18 ज्येष्ठा
27 रेवती
1 अश्विनी
10 मघा
19 मूल
2 भरणी
11पूर्वाफाल्गुनी
20 पूर्वाषाढ़ा
3 कृतिका
12 उत्तराफाल्गुनी
21 उत्तराषाढ़ा
5
मृगशिरा
5 मृगशिरा
14 चित्रा
23 धनिष्ठा
6 आर्द्रा
15 स्वाति
24 शतभिषा
7 पुनर्वसु
16 विशाखा
25 पूर्वाभाद्रपद
8 पुष्य
17 अनुराधा
26 उत्तराभाद्रपद
9 आश्लेषा
18 ज्येष्ठा
27 रेवती
1 अश्विनी
10 मघा
19 मूल
2 भरणी
11पूर्वाफाल्गुनी
20 पूर्वाषाढ़ा
3 कृतिका
12 उत्तराफाल्गुनी
21 उत्तराषाढ़ा
4 रोहिणी
13 हस्त
22 श्रवण
6
आर्द्रा
6 आर्द्रा
15 स्वाति
24 शतभिषा
7 पुनर्वसु
16 विशाखा
25 पूर्वाभाद्रपद
8 पुष्य
17 अनुराधा
26 उत्तराभाद्रपद
9 आश्लेषा
18 ज्येष्ठा
27 रेवती
1 अश्विनी
10 मघा
19 मूल
2 भरणी
11पूर्वाफाल्गुनी
20 पूर्वाषाढ़ा
3 कृतिका
12 उत्तराफाल्गुनी
21 उत्तराषाढ़ा
4 रोहिणी
13 हस्त
22 श्रवण
5 मृगशिरा
14 चित्रा
23 धनिष्ठा
7
पुनर्वसु
7 पुनर्वसु
16 विशाखा
25 पूर्वाभाद्रपद
8 पुष्य
17 अनुराधा
26 उत्तराभाद्रपद
9 आश्लेषा
18 ज्येष्ठा
27 रेवती
1 अश्विनी
10 मघा
19 मूल
2 भरणी
11पूर्वाफाल्गुनी
20 पूर्वाषाढ़ा
3 कृतिका
12 उत्तराफाल्गुनी
21 उत्तराषाढ़ा
4 रोहिणी
13 हस्त
22 श्रवण
5 मृगशिरा
14 चित्रा
23 धनिष्ठा
6 आर्द्रा
15 स्वाति
24 शतभिषा
8
पुष्य
8 पुष्य
17 अनुराधा
26 उत्तराभाद्रपद
9 आश्लेषा
18 ज्येष्ठा
27 रेवती
1 अश्विनी
10 मघा
19 मूल
2 भरणी
11पूर्वाफाल्गुनी
20 पूर्वाषाढ़ा
3 कृतिका
12 उत्तराफाल्गुनी
21 उत्तराषाढ़ा
4 रोहिणी
13 हस्त
22 श्रवण
5 मृगशिरा
14 चित्रा
23 धनिष्ठा
6 आर्द्रा
15 स्वाति
24 शतभिषा
7 पुनर्वसु
16 विशाखा
25 पूर्वाभाद्रपद
9
आश्लेषा
9 आश्लेषा
18 ज्येष्ठा
27 रेवती
1 अश्विनी
10 मघा
19 मूल
2 भरणी
11पूर्वाफाल्गुनी
20 पूर्वाषाढ़ा
3 कृतिका
12 उत्तराफाल्गुनी
21 उत्तराषाढ़ा
4 रोहिणी
13 हस्त
22 श्रवण
5 मृगशिरा
14 चित्रा
23 धनिष्ठा
6 आर्द्रा
15 स्वाति
24 शतभिषा
7 पुनर्वसु
16 विशाखा
25 पूर्वाभाद्रपद
8 पुष्य
17 अनुराधा
26 उत्तराभाद्रपद
10
मघा
1 अश्विनी
10 मघा
19 मूल
2 भरणी
11पूर्वाफाल्गुनी
20 पूर्वाषाढ़ा
3 कृतिका
12 उत्तराफाल्गुनी
21 उत्तराषाढ़ा
4 रोहिणी
13 हस्त
22 श्रवण
5 मृगशिरा
14 चित्रा
23 धनिष्ठा
6 आर्द्रा
15 स्वाति
24 शतभिषा
7 पुनर्वसु
16 विशाखा
25 पूर्वाभाद्रपद
8 पुष्य
17 अनुराधा
26 उत्तराभाद्रपद
9 आश्लेषा
18 ज्येष्ठा
27 रेवती
11
पूर्वाफाल्गुनी
2 भरणी
11पूर्वाफाल्गुनी
20 पूर्वाषाढ़ा
3 कृतिका
12 उत्तराफाल्गुनी
21 उत्तराषाढ़ा
4 रोहिणी
13 हस्त
22 श्रवण
5 मृगशिरा
14 चित्रा
23 धनिष्ठा
6 आर्द्रा
15 स्वाति
24 शतभिषा
7 पुनर्वसु
16 विशाखा
25 पूर्वाभाद्रपद
8 पुष्य
17 अनुराधा
26 उत्तराभाद्रपद
9 आश्लेषा
18 ज्येष्ठा
27 रेवती
1 अश्विनी
10 मघा
19 मूल
12
उत्तराफाल्गुनी
3 कृतिका
12 उत्तराफाल्गुनी
21 उत्तराषाढ़ा
4 रोहिणी
13 हस्त
22 श्रवण
5 मृगशिरा
14 चित्रा
23 धनिष्ठा
6 आर्द्रा
15 स्वाति
24 शतभिषा
7 पुनर्वसु
16 विशाखा
25 पूर्वाभाद्रपद
8 पुष्य
17 अनुराधा
26 उत्तराभाद्रपद
9 आश्लेषा
18 ज्येष्ठा
27 रेवती
1 अश्विनी
10 मघा
19 मूल
2 भरणी
11पूर्वाफाल्गुनी
20 पूर्वाषाढ़ा
13
हस्त
4 रोहिणी
13 हस्त
22 श्रवण
5 मृगशिरा
14 चित्रा
23 धनिष्ठा
6 आर्द्रा
15 स्वाति
24 शतभिषा
7 पुनर्वसु
16 विशाखा
25 पूर्वाभाद्रपद
8 पुष्य
17 अनुराधा
26 उत्तराभाद्रपद
9 आश्लेषा
18 ज्येष्ठा
27 रेवती
1 अश्विनी
10 मघा
19 मूल
2 भरणी
11पूर्वाफाल्गुनी
20 पूर्वाषाढ़ा
3 कृतिका
12 उत्तराफाल्गुनी
21 उत्तराषाढ़ा
14
चित्रा
5 मृगशिरा
14 चित्रा
23 धनिष्ठा
6 आर्द्रा
15 स्वाति
24 शतभिषा
7 पुनर्वसु
16 विशाखा
25 पूर्वाभाद्रपद
8 पुष्य
17 अनुराधा
26 उत्तराभाद्रपद
9 आश्लेषा
18 ज्येष्ठा
27 रेवती
1 अश्विनी
10 मघा
19 मूल
2 भरणी
11पूर्वाफाल्गुनी
20 पूर्वाषाढ़ा
3 कृतिका
12 उत्तराफाल्गुनी
21 उत्तराषाढ़ा
4 रोहिणी
13 हस्त
22 श्रवण
15
स्वाति
6 आर्द्रा
15 स्वाति
24 शतभिषा
7 पुनर्वसु
16 विशाखा
25 पूर्वाभाद्रपद
8 पुष्य
17 अनुराधा
26 उत्तराभाद्रपद
9 आश्लेषा
18 ज्येष्ठा
27 रेवती
1 अश्विनी
10 मघा
19 मूल
2 भरणी
11पूर्वाफाल्गुनी
20 पूर्वाषाढ़ा
3 कृतिका
12 उत्तराफाल्गुनी
21 उत्तराषाढ़ा
4 रोहिणी
13 हस्त
22 श्रवण
5 मृगशिरा
14 चित्रा
23 धनिष्ठा
16
विशाखा
7 पुनर्वसु
16 विशाखा
25 पूर्वाभाद्रपद
8 पुष्य
17 अनुराधा
26 उत्तराभाद्रपद
9 आश्लेषा
18 ज्येष्ठा
27 रेवती
1 अश्विनी
10 मघा
19 मूल
2 भरणी
11पूर्वाफाल्गुनी
20 पूर्वाषाढ़ा
3 कृतिका
12 उत्तराफाल्गुनी
21 उत्तराषाढ़ा
4 रोहिणी
13 हस्त
22 श्रवण
5 मृगशिरा
14 चित्रा
23 धनिष्ठा
6 आर्द्रा
15 स्वाति
24 शतभिषा
17
अनुराधा
8 पुष्य
17 अनुराधा
26 उत्तराभाद्रपद
9 आश्लेषा
18 ज्येष्ठा
27 रेवती
1 अश्विनी
10 मघा
19 मूल
2 भरणी
11पूर्वाफाल्गुनी
20 पूर्वाषाढ़ा
3 कृतिका
12 उत्तराफाल्गुनी
21 उत्तराषाढ़ा
4 रोहिणी
13 हस्त
22 श्रवण
5 मृगशिरा
14 चित्रा
23 धनिष्ठा
6 आर्द्रा
15 स्वाति
24 शतभिषा
7 पुनर्वसु
16 विशाखा
25 पूर्वाभाद्रपद
18
ज्येष्ठा
9 आश्लेषा
18 ज्येष्ठा
27 रेवती
1 अश्विनी
10 मघा
19 मूल
2 भरणी
11पूर्वाफाल्गुनी
20 पूर्वाषाढ़ा
3 कृतिका
12 उत्तराफाल्गुनी
21 उत्तराषाढ़ा
4 रोहिणी
13 हस्त
22 श्रवण
5 मृगशिरा
14 चित्रा
23 धनिष्ठा
6 आर्द्रा
15 स्वाति
24 शतभिषा
7 पुनर्वसु
16 विशाखा
25 पूर्वाभाद्रपद
8 पुष्य
17 अनुराधा
26 उत्तराभाद्रपद
19
मूल
1 अश्विनी
10 मघा
19 मूल
2 भरणी
11पूर्वाफाल्गुनी
20 पूर्वाषाढ़ा
3 कृतिका
12 उत्तराफाल्गुनी
21 उत्तराषाढ़ा
4 रोहिणी
13 हस्त
22 श्रवण
5 मृगशिरा
14 चित्रा
23 धनिष्ठा
6 आर्द्रा
15 स्वाति
24 शतभिषा
7 पुनर्वसु
16 विशाखा
25 पूर्वाभाद्रपद
8 पुष्य
17 अनुराधा
26 उत्तराभाद्रपद
9 आश्लेषा
18 ज्येष्ठा
27 रेवती
20
पूर्वाषाढ़ा
2 भरणी
11पूर्वाफाल्गुनी
20 पूर्वाषाढ़ा
3 कृतिका
12 उत्तराफाल्गुनी
21 उत्तराषाढ़ा
4 रोहिणी
13 हस्त
22 श्रवण
5 मृगशिरा
14 चित्रा
23 धनिष्ठा
6 आर्द्रा
15 स्वाति
24शतभिषा
7 पुनर्वसु
16 विशाखा
25 पूर्वाभाद्रपद
8 पुष्य
17 अनुराधा
26 उत्तराभाद्रपद
9 आश्लेषा
18 ज्येष्ठा
27 रेवती
1 अश्विनी
10 मघा
19 मूल
21
उत्तराषाढ़ा
3 कृतिका
12 उत्तराफाल्गुनी
21 उत्तराषाढ़ा
4 रोहिणी
13 हस्त
22 श्रवण
5 मृगशिरा
14 चित्रा
23 धनिष्ठा
6 आर्द्रा
15 स्वाति
24 शतभिषा
7 पुनर्वसु
16 विशाखा
25 पूर्वाभाद्रपद
8 पुष्य
17 अनुराधा
26 उत्तराभाद्रपद
9 आश्लेषा
18 ज्येष्ठा
27 रेवती
1 अश्विनी
10 मघा
19 मूल
2 भरणी
11पूर्वाफाल्गुनी
20 पूर्वाषाढ़ा
22
श्रवण
4 रोहिणी
13 हस्त
22 श्रवण
5 मृगशिरा
14 चित्रा
23 धनिष्ठा
6 आर्द्रा
15 स्वाति
24 शतभिषा
7 पुनर्वसु
16 विशाखा
25 पूर्वाभाद्रपद
8 पुष्य
17 अनुराधा
26 उत्तराभाद्रपद
9 आश्लेषा
18 ज्येष्ठा
27 रेवती
1 अश्विनी
10 मघा
19 मूल
2 भरणी
11पूर्वाफाल्गुनी
20 पूर्वाषाढ़ा
3 कृतिका
12 उत्तराफाल्गुनी
21 उत्तराषाढ़ा
23
धनिष्ठा
5 मृगशिरा
14 चित्रा
23 धनिष्ठा
6 आर्द्रा
15 स्वाति
24 शतभिषा
7 पुनर्वसु
16 विशाखा
25 पूर्वाभाद्रपद
8 पुष्य
17 अनुराधा
26 उत्तराभाद्रपद
9 आश्लेषा
18 ज्येष्ठा
27 रेवती
1 अश्विनी
10 मघा
19 मूल
2 भरणी
11पूर्वाफाल्गुनी
20 पूर्वाषाढ़ा
3 कृतिका
12 उत्तराफाल्गुनी
21 उत्तराषाढ़ा
4 रोहिणी
13 हस्त
22 श्रवण
24
शतभिषा
6 आर्द्रा
15 स्वाति
24 शतभिषा
7 पुनर्वसु
16 विशाखा
25 पूर्वाभाद्रपद
8 पुष्य
17 अनुराधा
26 उत्तराभाद्रपद
9 आश्लेषा
18 ज्येष्ठा
27 रेवती
1 अश्विनी
10 मघा
19 मूल
2 भरणी
11पूर्वाफाल्गुनी
20 पूर्वाषाढ़ा
3 कृतिका
12 उत्तराफाल्गुनी
21 उत्तराषाढ़ा
4 रोहिणी
13 हस्त
22 श्रवण
5 मृगशिरा
14 चित्रा
23 धनिष्ठा
25
पूर्वाभाद्रपद
7 पुनर्वसु
16 विशाखा
25 पूर्वाभाद्रपद
8 पुष्य
17 अनुराधा
26 उत्तराभाद्रपद
9 आश्लेषा
18 ज्येष्ठा
27 रेवती
1 अश्विनी
10 मघा
19 मूल
2 भरणी
11पूर्वाफाल्गुनी
20 पूर्वाषाढ़ा
3 कृतिका
12 उत्तराफाल्गुनी
21 उत्तराषाढ़ा
4 रोहिणी
13 हस्त
22 श्रवण
5 मृगशिरा
14 चित्रा
23 धनिष्ठा
6 आर्द्रा
15 स्वाति
24 शतभिषा
26
उत्तराभाद्रपद
8 पुष्य
17 अनुराधा
26 उत्तराभाद्रपद
9 आश्लेषा
18 ज्येष्ठा
27 रेवती
1 अश्विनी
10 मघा
19 मूल
2 भरणी
11पूर्वाफाल्गुनी
20 पूर्वाषाढ़ा
3 कृतिका
12 उत्तराफाल्गुनी
21 उत्तराषाढ़ा
4 रोहिणी
13 हस्त
22 श्रवण
5 मृगशिरा
14 चित्रा
23 धनिष्ठा
6 आर्द्रा
15 स्वाति
24 शतभिषा
7 पुनर्वसु
16 विशाखा
25 पूर्वाभाद्रपद
27
रेवती
9 आश्लेषा
18 ज्येष्ठा
27 रेवती
1 अश्विनी
10 मघा
19 मूल
2 भरणी
11पूर्वाफाल्गुनी
20 पूर्वाषाढ़ा
3 कृतिका
12 उत्तराफाल्गुनी
21 उत्तराषाढ़ा
4 रोहिणी
13 हस्त
22 श्रवण
5 मृगशिरा
14 चित्रा
23 धनिष्ठा
6 आर्द्रा
15 स्वाति
24 शतभिषा
7 पुनर्वसु
16 विशाखा
25 पूर्वाभाद्रपद
8 पुष्य
17 अनुराधा
26 उत्तराभाद्रपद

अष्टकवर्ग बिंदु संख्यानुसार भावफल

प्राचीन ज्योतिष ग्रन्थ मानसागरी में शास्त्रकार ने अष्टकवर्ग पद्धति से भावफल निश्चित किया है. भाव को प्राप्त बिंदुओं अनुसार भावफल इस प्रकार है –

बिंदु संख्या
फल
14 बिंदुकष्ट, मृत्युभय
15 बिंदुराज्य और सरकार से परेशानी
16 बिंदुदुर्गति, दुर्भाग्य
17 बिंदुबीमारी और भावहानि
18 बिंदुधनहानि
19 बिंदुसंबंधियों और मित्रों से कलह
20 बिंदुअत्यधिक व्यय, गलत कामों में रूचि
21 बिंदुबीमारी, धनहानि
22 बिंदुस्मृतिनाश, अविवेकपूर्ण निर्णय, कमजोरी, पारिवारिक झगड़े
23 बिंदुचिंता, कष्ट और हानि
24 बिंदुअत्यधिक व्यय द्वारा धनसंकट, अचानक हानि
25 बिंदुदुर्भाग्य
26 बिंदुपरेशानियां, शिथिलता, अस्थिरता
27 बिंदुअधिक व्यय, दिग्भ्रमित मन, व्याकुलता
28 बिंदुलाभ परंतु संतोषप्रद नहीं
29 बिंदुसम्मान
30 बिंदुसंतोष, सम्मान और लाभ
31 से 33 बिंदुऊर्जावान, मान सम्मान
34 से 40 बिंदुभौतिक सुखों में वृद्धि
41 बिंदुउत्तम धनसंपदा, आय के अनेक स्रोत
42 बिंदुभौतिक सुख समृद्धि के साथ धर्माचरण और सम्मान प्राप्ति
43 बिंदुसुख समृद्धि और प्रसन्नता
44 से 45 बिंदुमान सम्मान और विभिन्न स्रोतों से लाभ
46 से 47 बिंदुशुभ गुणयुक्त श्रेष्ठ जीवन

ग्रहों द्वारा प्रदत्त मृत्यु कारण

जन्मकुंडली का अष्टम भाव मृत्युभाव है. अष्टम भाव और अष्टमेश पर पड़ने वाले अन्य ग्रहों के प्रभाव से मृत्यु के प्रकार का पता चलता है. नवग्रहों द्वारा प्रदत्त मृत्यु प्रकार इस प्रकार हैं –

सूर्य – अग्निकांड, लूं लगना, सन्निपात, पेशाब रुकना, बेहद तेज बुखार.

चंद्रमा – जल में डूब जाना, जलचरों द्वारा हमला या विषाक्तता, टीबी, फेफड़ों में पानी भरना, निमोनिया, रक्ताल्पता.

मंगल – सड़क दुर्घटनाएं, हथियारों और विस्फोटकों से चोट, ऊंचाई से गिरना, जादू टोना एवं तांत्रिक अभिचार, पीलिया.

बुध – लकवा, स्नायु विकार, अंडकोष विकृति, वायरल, नसों के रोग, अपच.

बृहस्पति – हृदयघात एवं हृदयरोग, तेज बुखार, कमजोरी, चर्बीजमना, यकृत रोग.

शुक्र – यौन व्याधियां, मूत्र व्याधियां, कफ रोग, दवा ना मिलना, भुखमरी.

शनि – वातविकार, अवसाद, फोड़े और ट्यूमर, मियादी बुखार, दीर्घकालिक रोग, फ़ूड पॉइज़निंग.

राहु – कैंसर, समझ ना आने वाले रोग, वायवीय हस्तक्षेप.

केतु – गुर्दे फेल हो जाना, फेफड़ों की निष्क्रियता, गंभीर त्वचा रोग, कुत्ते का काटना.

नवग्रह समिधा

ज्योतिष में प्रत्येक ग्रह की समिधा को नियत किया गया है.
जो की इस प्रकार है –

ग्रह समिधा
सूर्य मदार (आक)
चंद्रमा पलाश
मंगल खैर (कत्था)
बुध अपामार्ग (आंधीझाड़ा)
बृहस्पति पीपल
शुक्र गूलर
शनि शमी (खेजड़ी)
राहु दूब अथवा चंदन
केतु कुश अथवा अश्वगंधा

 

ज्योतिष में देव लग्न और आसुरी लग्न

ज्योतिष में जन्म लग्न के अलावा चंद्रमा और सूर्य अधिष्ठित भाव को भी लग्न माना गया है. ऐसा इसलिए है की चंद्रमा और सूर्य दोनों स्व का प्रतिनिधित्व करते हैं. चंद्रमा जहां मन का प्रतिनधि है वहीँ सूर्य आत्मा का प्रतिनिधित्व करता है. इन दोनों का संयोग ही जीव है.
ऐसे में प्रश्न उठता है की तीनों लग्नों में से कौन सी लग्न व्यक्ति पर प्रभावी है. इसके लिए शास्त्रकारों ने सभी बारह लग्नों को देव और आसुरी दो श्रेणियों में विभाजित कर दिया है. यह विभाजन इस प्रकार है – सूर्य, चंद्र, मंगल, बृहस्पति को देव श्रेणी और बुध, शुक्र और शनि को आसुरी श्रेणी माना गया है.
अब यदि जन्मकुंडली में लग्न, सूर्य और चंद्रमा अधिष्ठित भाव एक श्रेणी के हैं अथवा इनमे से कोई दो जिस श्रेणी के हैं उस श्रेणी की लग्न जातक पर प्रभावी मानी जाएंगी. इस प्रकार मेष, वृश्चिक, कर्क, सिंह, धनु और मीन राशियों की लग्न देव और वृषभ, मिथुन, कन्या, तुला, मकर और कुंभ राशियों की लग्न आसुरी कहलाएंगी.
अब जन्मलग्न, सूर्य और चंद्रमा अधिष्ठित भाव इन तीनों में से जिन दो का श्रेणी बाहुल्य होगा वह दो लग्न निश्चित रूप से फलादेश को व्यक्त और नियंत्रित करेंगी.

सिद्ध पारद महिमा

पारद शिवलिंग

पारद साक्षात शिव है. सिद्ध पारद यमांतक अर्थात मृत्यु का नाश करने वाला और कच्चा पारद प्राणग्राहक अर्थात प्रलयंकारी है. सिद्ध पारद दर्शन एवं पूजन, धारण और भक्षण के लिये महा कल्याणकारी माना गया है. पारद शिवलिंग जो की गंधक वेदी पर आसीन हो करोड़ो पुण्यों का प्रदाता कहा गया है. इसके दर्शन मात्र से सभी पाप नष्ट हो जाते हैं. इसी प्रकार सिद्ध पारद से बनी अन्य वस्तुएं जैसे की पारद मुद्रिका, पारद पेंडेंट, पारद गुटिका, पारद पिरामिड, पारद लक्ष्मी गणेश, पारद पात्र और पारद श्रीयंत्र के उपचार उपयोग चमत्कारिक लाभ देने वाले हैं. ब्रह्म वैवर्त पुराण, लिंग पुराण, स्कंद पुराण, रस रत्नाकर, निघंटु प्रकाश, शिवनिर्णय रत्नाकर आदि प्राचीन भारतीय ग्रंथ सिद्ध पारद की महिमा गाते नहीं थकते. आज के व्यस्त युग में जहां मनुष्य के लिये जटिल और विधिसम्मत पूजापाठ करना और करवाना मुश्किल सा हो गया है. ऐसे में सिद्ध पारद का दर्शन, धारण एवं अन्य उपयोग सुखी और समृद्ध जीवन के लिये अमोघ उपाय है.

पारद मुद्रिका

पारद मुद्रिका नवग्रह शांति के लिए धारण की जाती है. इस मुद्रिका की विशेषता है की जिस भी ग्रह का संकल्प लेकर इसे धारण किया जाता है यह उसी के अनुरूप परिणाम देती है. किसी विशेष ग्रह के फल को अनुकूल करने के साथ साथ यह सभी नवग्रहों को संतुलित करने की क्षमता रखती है.

पारद पेंडेंट

पारद सिद्धि के बारह संस्कारों से सिद्ध किया गया पारद पेंडेंट एक बहुत ही उपयोगी पेंडेंट है. इसे गले में धारण किया जाता है. शरीर से निरंतर संपर्क में रहने वाला यह पेंडेंट ह्रदय को अपूर्व बल देता है. सभी प्रकार की नकारात्मकता को नष्ट कर पारद पेंडेंट एक नये जोश और उत्साह द्वारा व्यक्ति का मार्ग प्रशस्त करता है. इसे धारण कर स्नान करने से दिव्य पारद स्नान का फल प्राप्त होता है.

ज्योतिष में विभिन्न समयकाल

होराकाल – अहोरात्र शब्द से होरा शब्द की उत्पत्ति हुई है. होरा का मान एक घंटे का समय है, और यह समय ग्रहों द्वारा निर्धारित होता है. दिन और रात मिलकर कुल 24 होरा होते हैं. जिस दिन जो वार होता है उस दिन सूर्योदय के पश्चात एक घंटे का समय उस वार के अधिपति ग्रह का होता है. यह उस ग्रह का होरा कहलाता है. इसके बाद वाला एक घंटे का होरा उस वार से छठे वार स्वामी का होता है और यह क्रम इसी प्रकार चलता रहता है. सभी मुहूर्तों में होरा मुहूर्त श्रेष्ठ माना गया है.

प्रात:काल – प्रतिदिन सूर्योदय से 48 मिनट पूर्व तक का समय प्रात:काल कहा जाता है. सामान्य व्यक्ति के लिए नींद से जागने का यह आदर्श समय है.

अरुणोदयकाल – सूर्योदय से 1 घंटा 12 मिनट तक का समय अरुणोदय काल होता है. आकाश में लालिमा दृष्टिगोचर होने लगती है.

उषाकाल – सूर्योदय से 2 घंटे पूर्व तक का समय उषाकाल कहलाता है. इस समय का भ्रमण उषापान कहलाता है जो की स्वास्थ्य के लिए परम हितकारी माना गया है.

अभिजितकाल – दोपहर 11 : 36 बजे से 12 :24 बजे तक का समय अभिजितकाल कहलाता है. लेकिन बुधवार को वर्जित होता है.

प्रदोषकाल – सूर्यास्त के 48 मिनट बाद तक का समय प्रदोषकाल कहलाता है.

गौधूलिकाल – सूर्यास्त से 24 मिनट पहले और 24 मिनट बाद तक समय गौधूलिकाल कहलाता है.

राहुकाल – प्रतिदिन 1.5 घंटे का समय राहुकाल कहलाता है. प्रत्येक वार को यह अलग समय पर नियत है जो की इस प्रकार है – रविवार 16 : 30 से 18 : 00, सोमवार 07 : 30 से 09 : 00, मंगलवार 15 : 00 से 16 : 30, बुधवार 12 : 00 से 13 : 30, बृहस्पतिवार 13 : 30 से 15 : 00, शुक्रवार 10 : 30 से 12 : 00 और शनिवार 09 : 00 से 10 : 30 तक.

गुलिककाल – प्रतिदिन 1.5 घंटे का समय गुलिककाल होता है जो इस प्रकार है – रविवार 15 : 00 से 16 : 30, सोमवार 13 : 30 से 15 : 00, मंगलवार 12 : 00 से 13 : 30, बुधवार 10 : 30 से 12 : 00, बृहस्पतिवार 09 : 00 से 10 : 30, शुक्रवार 07 : 30 से 09 : 00 और शनिवार 06 : 00 से 07 : 30 तक.

यमगण्डकाल – प्रतिदिन 1.5 घंटे का समय यमगण्डकाल होता है जो इस प्रकार है – रविवार 12 : 00 से 13 : 30, सोमवार 10 : 30 से 12 : 00, मंगलवार 09 : 00 से 10 : 30, बुधवार 07 : 30 से 09 : 00, बृहस्पतिवार 06 : 00 से 07 : 30, शुक्रवार 15 : 00 से 16 : 30 और शनिवार 13 : 30 से 15 : 00 तक.

रविदास जयंती 2016

भक्तिकाल के संतों में संत रविदास का प्रमुख स्थान है. इन्हें रैदास भी कहा जाता है. संत रविदास का जन्म पंद्रहवीं शताब्दी में काशी के चर्मकार परिवार में हुआ था. जूते बनाना इनका पैतृक व्यवसाय था. संत रविदास आत्मज्ञानी संत थे. मन चंगा तो कठौती में गंगा नामक महान उक्ति संत रविदास जी की ही देंन है. इस उक्ति से जुड़ी कथा इनके विराट व्यक्तित्व को दर्शाती है.
प्रत्येक वर्ष माघ मास की पूर्णिमा को इनके जन्मदिवस के रूप में मनाया जाता है. संत रविदास जी ने अनेकों दोहों और भक्ति रचनाओं का सृजन कर समाज में व्याप्त कुरूतियों और पाखंड को समाप्त करने का प्रयास किया.
प्रसिद्द महिला संत मीरा बाई के ये गुरु थे. मीरा बाई ने कहा है ‘गुरु मिलीया रविदास जी दीनी ज्ञान की गुटकी, चोट लगी निजनाम हरी की महारे हिवरे खटकी’.
संत रविदास जी की वाणी इतनी प्रभावशाली थी की सिक्खों के धर्मग्रंथ श्री गुरुग्रंथ साहिब में भी इनकी वाणी के 41 पदों का समावेश किया गया है.
इस वर्ष इनकी जयंती 22 फरवरी को मनाई जा रही है.

बसंत पंचमी 2016


माघ मास शुक्लपक्ष की पंचमी तिथि बसंत पंचमी कहलाती है. हिन्दू मान्यता में बसंत पंचमी की महिमा अपार है.

एक ओर यह ऋतुराज वसंत का आगमन पर्व है तो दूसरी ओर विद्या और ज्ञान की देवी सरस्वती का प्रकाट्य दिवस भी है.
शरदऋतु के बाद वसंत का आगमन प्राणों में नवसंचार कर देता है. शरद में जर्जर हुई प्रकृति उल्लासित हो हरी पीली रंगीन चुनरिया धारण कर पूर्ण यौवन को प्राप्त होती है. चहुं ओर कामदेव नृत्य करते जान पड़ते हैं. हवा में उत्साह और मस्ती घुले होते हैं.

बसंत पंचमी को सभी कार्यों के लिए अत्यंत शुभ माना
गया है. विद्यारंभ, गृह प्रवेश, व्यापार आरम्भ आदि के लिए यह श्रेष्ठ दिन है. इस समय सूर्यदेव भी उत्तरायण होते हैं.

ज्योतिष में भी कुंडली का पंचम भाव शिक्षा और आमोद प्रमोद का भाव है, और यही इस पर्व का प्राण भी है. इस दिन पीले वस्त्र पहनना, पीले फूलों का श्रृंगार, पीला चंदन लेप करना और पीले रंग के मिष्ठान्न बनाने का विशेष महत्व है.
वर्ष 2016 की बसंत पंचमी बहुत ही शुभ योगों से पूरित है. इस दिन सर्वार्थ सिद्ध योग के साथ ही श्रीवत्स योग का भी निर्माण हो रहा है जो की इस पर्व में चार चांद लगा रहा है.Vasant Panchami