Monthly Archives: November 2015

ग्रहों के रत्न और उपरत्न

नवग्रहों में प्रत्येक का अपना रत्न है.
यदि अच्छी गुणवत्ता का लिया जाये तो रत्न एक बहुमूल्य वस्तु है. कई बार चाह कर भी व्यक्ति रत्न नहीं पहन पाता.
ऐसे में निराश होने की बजाय रत्न के उपरत्न को धारण कर लेना चाहिये. प्रत्येक रत्न के अनेकों उपरत्न होते हैं. यह उपरत्न काफी सस्ते होते हैं और व्यक्ति इनकी पूरी माला या ब्रेसलेट आसानी से खरीद सकता है. फर्क सिर्फ यह पड़ता है की इन उपरत्नों का असर रत्न के मुकाबले कम होता है. कितना कम होता है यह कुछ निश्चित नहीं कहा जा सकता पर अनुभव में इसे रत्न की बनिस्पत 20% से 40% तक आंका गया है.

विभिन्न रत्नों के उपरत्न इस प्रकार हैं –

ग्रहरत्न उपरत्न
सूर्य माणिक्यगार्नेट, सितारा माणिक्य, लालड़ी, संगसितारा
चंद्रमा मोतीमूनस्टोन
मंगल लाल मूंगा मूंगे का कोई उपरत्न नहीं होता
बुध पन्ना पेरिडॉट, मरगज, हरा ऑनेक्स
बृहस्पति पीला पुखराज सुनहला
शुक्र हीरा ओपल
शनि हल्का आसमानी नीलम लाजवर्त, फिरोजा
राहू
गहरा नीलम नीली
केतु लहसुनिया, लाल मूंगा कोई उपरत्न नहीं

नवग्रहों की दान वस्तुएं

ज्योतिष में व्यवस्था है की पीड़ित ग्रहों की वस्तुएं दान की जाएं.

यह ग्रहपीड़ा शांति के लिए किया जाने वाला महत्वपूर्ण उपाय है. इस उपाय में ग्रह की कारक वस्तु को मंदिर , डाकोत , अपाहिजों और गरीबों में दान किया जाता है.

इससे अनिष्टकारक ग्रह के प्रकोप में कमी आ जाती है. इस उपाय में कुंडली विवेचना उपरांत ही तय किया जाता है की अमुक वस्तु कितनी बार दान करनी है. कई बार यह उपाय केवल एक बार करना होता है तो कभी कई बार दोहराना होता है.

ग्रहकारक वस्तु दान स्थान एवं पात्र
सूर्यगेंहू, तांबे का पात्र, माणिक्य या लालड़ीमंदिर
चंद्रमाचावल, चांदी, मोतीमंदिर
मंगल लाल मसूर, तांबे का पात्र, मूंगा मंदिर
बुध साबुत मूंग, पन्ना, कांसे का पात्र मंदिर
बृहस्पति देसी चने, देसी घी, स्वर्ण, पुखराज या सुनहला मंदिर
शुक्र
सुगंधित पदार्थ, रेशमी वस्त्र, चांदी का पात्र, ओपल मंदिर
शनि काले उड़द, सरसों का तेल, चमड़े के काले जूते, लोहे का पात्र, हलके रंग का नीलमडाकौत
राहू गहरे नीले वस्त्र, कढ़ी चावल, खिचड़ी, तंबाखू, देसी शराब कोढ़ी और भिखारी
केतु ईमली, काला सफ़ेद वस्त्र, बैसाखी, कृत्रिम अंग, श्रवण यंत्र, ट्राई साईकिल कोढ़ी और विकलांग

ग्रहों के रंग

प्रत्येक ग्रह का अपना रंग है.

योगकारक परन्तु निर्बली ग्रहों के रंगों का अधिकाधिक प्रयोग कर उन्हें बल दिया जा सकता है.

इसी प्रकार विपरीत फल देने वाले ग्रहों के रंग त्याग देना ही श्रेयस्कर है.

राहू और केतु दो ऐसे ग्रह हैं जिनके नियंत्रक रंग भी होते हैं. इनके नियंत्रक रंगों का प्रयोग कर इनके द्वारा दिये जा रहे बुरे फलों में काफी हद तक कमी की जा सकती है.

ग्रहों के रंग इस प्रकार से है –

ग्रह रंग नियंत्रक रंग
सूर्य नारंगी और गुलाबी
चंद्रमापीली झाईं मिश्रित सफ़ेद (ऑफ व्हाईट)
मंगल गहरा लाल
बुधहरा और तोतिया
बृहस्पतिसुनहला और पीला
शुक्रझक्क सफ़ेद (अल्ट्रा व्हाईट) और रंगबिरंगा
शनिहल्का नीला आसमानी
राहूगहरा नीला भूरा (ब्राउन)
केतुधूएं जैसा सलेटीगहरा लाल

नवग्रहों के देवी देवता

ज्योतिष में नवग्रहों के नियत अधिदेवी और अधिदेवता हैं.

ग्रह विशेष की पूजा अर्चना के लिए उसके प्रतिनिधि देवी या देवता की उपासना की जाती है.

इसमें निहितार्थ यह है की ज्योतिषीय विश्लेषण के पश्चात निश्चित होता है की व्यक्ति को किस तत्व यानि देवी देवता की आवश्यकता है.

उस विशेष देवी या देवता की पूजा अर्चना से व्यक्ति को वांछित भाव और ऊर्जा प्राप्त होती है और उसका नवग्रह समीकरण संतुलित हो जाता है.

ग्रह देवी देवता
सूर्य रूद्र और भगवान सूर्यनारायण
चंद्रमा भगवान शिव और शिव परिवार
मंगल भगवान कार्तिकेय और हनुमान जी
बुध भगवान विष्णु और उनके अवतार
बृहस्पति भगवान दत्तात्रेय और अपने गुरु
शुक्र
देवी महालक्ष्मी
शनि भैरव देव
राहू देवी दुर्गा
केतु श्रीगणेश

नवग्रह रत्नों की वैकल्पिक जड़ियां

रत्नों को अंगूठियों और लॉकेट रूप में ज्योतिषीय उपाय के तौर पर धारण किया जाता है.

इसके पीछे निहितार्थ किसी ग्रह को बलवान करना होता है या फिर शांत.

लेकिन कई बार अनुशंसित रत्न के अत्यधिक महंगा होने के कारण लोग स्वयं को उसे खरीदने में असमर्थ पाते हैं.

ज्योतिष में इस समस्या का भी समाधान है. रत्न के अभाव में संबंधित ग्रह के वृक्ष की जड़ को ग्रह की धातु के लॉकेट या ताबीज में भरकर गले अथवा भुजा पर धारण किया जा सकता है.

इससे रत्न के समान ही फलप्राप्ति होगी. रत्न के मुकाबले जड़ी धारण करने में कुछ उन्नीस बीस का अंतर पड़ सकता है परन्तु लाभ अवश्य होगा.

नवग्रहों के रत्नों की वैकल्पिक जड़ियां इस प्रकार से हैं –

ग्रह रत्न वैकल्पिक जड़ी धातु
सूर्य माणिक्य आक की जड़ तांबा और स्वर्ण
चंद्रमा मोती पलाश की जड़
चांदी
मंगल मूंगा खैर की जड़ तांबा और स्वर्ण
बुध पन्ना अपामार्ग की जड़ कांसा और स्वर्ण
बृहस्पति पुखराज पीपल की जड़ स्वर्ण
शुक्र ओपल गूलर की जड़ चांदी
शनि नीलम शमी की जड़ लोहा और त्रिलोह
राहु
गोमेद सफ़ेद चंदन पंचधातु
केतु लहसुनिया अश्वगंधा की जड़ पंचधातु

कांकणी विचार / जाने दूसरों की अपने लिए उपयोगिता

कांकणी विचार एक ऐसी अद्भुत विद्या है जिसके द्वारा आप किसी भी व्यक्ति से अपना लाभ हानि विश्लेषण सरलता से जान सकते हैं. आपको पता चल जाएगा की अमुक संबंध लाभप्रद रहेगा या हानिप्रद.

क्रम संख्या       वर्ण                                                                      वर्ग

क्रम संख्या वर्णाक्षर प्रतीक
1अ आ इ ई उ ऊ ए ऐ ओ औ ऋ अं अ: गरुड़
2क ख ग घ ङ मार्जार (बिलाव)
3च छ ज झ ञ सिंह (शेर)
4ट ठ ड ढ ण श्वान (कुत्ता)
5त थ द ध न सर्प (सांप)
6प फ ब भ म मूषक (चूहा)
7य र ल व मृग (हिरण)
8श ष स ह क्ष त्र ज्ञ मेढ़ा (बकरा)

कांकणी विद्या में देवनागरी वर्णमाला को 8 वर्गों में बांट दिया जाता है और प्रत्येक वर्ग का एक प्रतिनिधि जीव जैसे गरुड़ , शेर , कुत्ता आदि होता है. सामान्य तौर पर सभी यह बात जानते हैं की प्रत्येक जीव सभी का मित्र नहीं होता. कुछ से उसकी नैसर्गिक शत्रुता होती है. जैसे गरुड़ सांप का दुश्मन होता है और बिलाव चूहे का.
यही बात कांकणी फलादेश का आधार है.

आईये देखें की कांकणी फलादेश कैसे प्राप्त किया जाता है. सबसे पहले आप उपरोक्त वर्गों में देखें की आपके नाम का प्रथम वर्णाक्षर किस वर्ग में हैं. उस वर्ग की क्रम संख्या को नोट कर लें. अब जिस व्यक्ति से लाभ हानि का विचार करना है उसके नाम के प्रथम वर्णाक्षर वाले वर्ग की संख्या नोट कर लें.
इसे उदाहरण द्वारा इस प्रकार समझें –

रमेश नामक व्यक्ति अरविंद नाम के व्यक्ति से कुछ लेनदेन करना चाहता है और वह जानना चाहता है की उसे अरविंद से लाभ होगा या हानि. रमेश का नामाक्षर वर्ग संख्या 7 में है और अरविंद का नामाक्षर वर्ग संख्या 1 में. अब हम रमेश की वर्ग संख्या 7 को 2 से गुणित कर उसमें अरविंद की वर्ग संख्या 1 जोड़ देंगे. इस प्रकार हमें संख्या मिलेगी 7 x 2 +1 = 15. अब इस प्राप्त संख्या को 8 से भाग दे देंगे 8/15. इससे हमें शेष 7 की प्राप्ति होगी.

अब यही प्रक्रिया अरविंद के लिये दोहराएंगे. 1 x 2 + 7 = 9. प्राप्त योग को 8 से भाग दे देंगे 8/9. इससे शेष 1 प्राप्त होगा.
हम देखेंगे की रमेश का शेष 7 अरविंद के शेष 1 से बहुत अधिक है. अत: रमेश यहां ऋणी और अरविंद धनी कहलायेगा. रमेश को अरविंद से कोई लाभ प्राप्त नहीं होगा जबकि अरविंद को रमेश से अपार लाभ प्राप्त होगा.

इस विद्या द्वारा केवल व्यक्तियों के नाम ही नहीं शहरों और संस्थानों के नाम द्वारा भी व्यक्ति उनसे प्राप्त होने वाले लाभ हानि का विश्लेषण कर सकता है.
साथ ही पूर्वजन्म के ऋणानुबंध को भी कांकणी विचार द्वारा जाना जा सकता है की कौन किसका ऋणी है.
नामाक्षर समान वर्ग का होने पर परस्पर सम फल जानना चाहिए…

नवग्रहों के वृक्ष और उनका उपयोग

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प्रत्येक ग्रह का अपना कारक वृक्ष होता है.
इस वृक्ष का सेवन, धारण और संवर्धन ग्रहपीड़ा शांति और उसकी सबलता के लिए एक अति महत्वपूर्ण ज्योतिषीय उपाय है. ग्रह योगकारक लेकिन निर्बली हो या फिर नकारात्मक प्रभाव दे रहा हो तो इन वृक्षों की पूजा अर्चना, इनका औषधीय स्नान और धारण आदर्श है.

पूजा अर्चना के अंतर्गत वृक्षों का रोपण, संवर्धन और दर्शन आता है. औषधीय स्नान वृक्ष की जड़, छाल, फूल पत्ती आदि को जल में मिलाकर स्नान करना है. धारण में वृक्ष की लकड़ी अथवा जड़ को ताबीज आदि के द्वारा शरीर पर पहना जाता है.

नवग्रहों के वृक्ष इस प्रकार हैं –

ग्रह ग्रह वृक्ष
सूर्य आक (मदार)
चंद्रमा पलाश
मंगल खैर (कत्था)
बुध अपामार्ग (आंधीझाड़ा)
बृहस्पति पीपल
शुक्र गूलर
शनि शमी (खेजड़ी)
राहू चंदन
केतु अश्वगंधा

 

नक्षत्रों के वृक्ष

जन्म समय चन्द्रमा जिस नक्षत्र में होता है वह व्यक्ति का जन्म नक्षत्र कहलाता है.

प्रत्येक नक्षत्र का अपना निश्चित स्वभाव और गुणधर्म होता है. जन्म नक्षत्र एक बहुत महत्वपूर्ण चीज है. व्यक्ति का सारा व्यक्तित्व अपने जन्म नक्षत्र से बंधा होता है.

चंद्रमा मन का कारक है. जन्म के समय इसकी नक्षत्र विशेष में उपस्थिति उस नक्षत्र के स्वभाव को मन द्वारा धारण कर लेना है.
ज्योतिष में नक्षत्रों के वृक्षों का भी वर्णन मिलता है. प्रत्येक नक्षत्र का अपना एक वृक्ष होता है. व्यक्ति के लिए अपने जन्म नक्षत्र की पहचान होना बहुत ही महत्वपूर्ण जानकारी है. अपने जन्म नक्षत्र का पालन पोषण और संवर्धन व्यक्तित्व को सबल और जीवन को निष्कंटक बनाता है.
ज्योतिष में कहा गया है की व्यक्ति भूलकर भी अपने जन्म नक्षत्र के वृक्ष को क्षति ना पहुंचाए. अन्यथा उसके सितारे गर्दिश में आ जायेंगे.
आयुर्वेद में भी व्यक्ति को उसके नक्षत्र वृक्ष से बनी औषधि का सेवन निषेध माना गया है. नहीं तो रोगी को लाभ के बदले हानि होगी. इसीलिये प्राचीन भारत में वैद्य अनिवार्य रूप से ज्योतिषी भी होता था.

ज्योतिषीय अवधारणा में अपने नक्षत्र वृक्ष का पालन पोषण और उसकी देखभाल सुखी जीवन के लिए एक बहुमूल्य सूत्र है.

नक्षत्रों के वृक्ष इस प्रकार हैं –

नक्षत्र नक्षत्र वृक्ष
अश्विनी कुचला
भरणी आंवला
कृत्तिका गूलर
रोहिणी जामुन
मृगशिरा खैर (कत्था)
आर्द्रा शीशम
पुनर्वसु बांस
पुष्य पीपल
आश्लेषा नागचम्पा
मघा बरगद
पूर्वाफाल्गुनी पलाश
उत्तराफाल्गुनी पाकड़
हस्त रीठा
चित्रा बेल
स्वाति अर्जुन
विशाखा बबूल
अनुराधा मौलश्री
ज्येष्ठा चीड़
मूल साल
पूर्वाषाढ़ा जलवेतस (बेंत)
उत्तराषाढ़ा कटहल
श्रवण आक (मदार)
धनिष्ठा शमी (खेजड़ी)
शतभिषा कदंब
पूर्वाभाद्रपद नीम
उत्तराभाद्रपद आम
रेवती महुआ

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नवग्रह बीजमंत्र / जप संख्या और जप समय

कष्ट निवारण और ग्रहपीड़ा शांति हेतु हिन्दू परंपरा में नवग्रहों के बीजमंत्र जप का विधान है. कष्टों और पीड़ा का संबंध जिस ग्रह से हो उसके बीजमंत्र जप बहुत लाभ देते हैं. विधिपूर्वक जप पूर्ण कर लेने पर संबंधित ग्रह की कृपा प्राप्त होती है और कष्टों का निवारण सहज ही हो जाता है.

नवग्रह मंत्र और जप संख्या इस प्रकार से हैं –

सूर्य – ॐ ह्रां ह्रीं ह्रौं स: सूर्याय नमः
जप संख्या – 7000
जप समय – सूर्योदय काल

चंद्रमा – ॐ श्रां श्रीं श्रौं स: चंद्राय नमः
जप संख्या – 11000
जप समय – संध्याकाल

मंगल – ॐ क्रां क्रीं क्रौं स: भौमाय नमः
जप संख्या – 10000
जप समय – दिन का प्रथम प्रहर

बुध – ॐ ब्रां ब्रीं ब्रौं स: बुधाय नमः
जप संख्या – 9000
जप समय – मध्याह्न काल

बृहस्पति – ॐ ग्रां ग्रीं ग्रौं स: गुरवे नमः
जप संख्या – 19000
जप समय – प्रात:काल

शुक्र – ॐ द्रां द्रीं द्रौं स: शुक्राय नमः
जप संख्या – 18000
जप समय – ब्रह्मवेला

शनि – ॐ प्रां प्रीं प्रौं स: शनैश्चराय नमः
जप संख्या – 23000
जप समय – संध्याकाल

राहु – ॐ भ्रां भ्रीं भ्रौं स: राहवे नमः
जप संख्या – 18000
जप समय – रात्रिकाल

केतु – ॐ स्रां स्रीं स्रौं स: केतवे नमः
जप संख्या – 17000
जप समय – रात्रिकाल

जप संकल्प करने पर प्रतिदिन कम से कम एक माला (108 बार) जप आवश्यक है… Japa Yoga 1

मुस्लिम मत से भाग्य रत्न जानना

अपना भाग्य रत्न जानने का मुस्लिम तरीका बहुत सरल है.
इसके लिए आपको नवग्रहों के मुस्लिम नाम और एक छोटी सी गणना की आवश्यकता होती है. इस गणना द्वारा कोई भी बड़ी आसानी से अपना भाग्य रत्न स्वयं पता कर सकता है.

लेकिन ध्यान रहे यह ज्योतिष का मुस्लिम दृष्टिकोण है और किसी एक पद्धति की दूसरी पद्धति से तुलना बेमानी है.

मुस्लिम नवग्रहों के नाम और गणना निम्न प्रकार से है –

हिंदी नाम मुस्लिम नाम ग्रह का रत्न
सूर्य शम्स माणिक्य
चंद्र कमर मोती
बृहस्पति मुश्तरी पुखराज
राहु रास गोमेद
बुध अतारु पन्ना
शुक्र जोहरा हीरा और ओपल
केतु जनब लहसुनिया
शनि जुहल नीलम
मंगल मर्रीख मूंगा

 

गणना के लिए व्यक्ति को अपनी जन्म तारीख और सन पता होना चाहिए.
जैसे की यदि किसी व्यक्ति का जन्म तारीख विवरण 15 – 10 – 1980 है. ध्यान रहे की हमें केवल सन लेना है ईसवी सन नहीं. यानि हम 1980 का सिर्फ 80 ही लेंगे 19 नहीं. ऐसे ही यदि किसी व्यक्ति का जन्म अगर 2005 को हुआ है तो हम केवल 05 ही लेंगे.

अब उपरोक्त तारीख को जोड़ लेंगे – 15 + 10 + 80 = 105
इस प्राप्त 105 योगफल को 9 से भाग दे देंगे. 9 से भाग देने पर हमें 6 शेष मिलेगा.
ग्रहों को क्रमानुसार गिनने पर शेष 1 तो शम्स , 2 का कमर , 3 का मुश्तरी , 4 का रास , 5 का अतारु , 6 का जोहरा , 7 का जनब , 8 का जुहल और 9 का मर्रीख होगा. यदि कोई शेष नहीं बचता तो भी मर्रीख माना जायेगा.

इस प्रकार ऊपर की गई गणना में हमें शेष 6 जोहरा की प्राप्ति हुई. जोहरा यानि शुक्र का भाग्य रत्न हीरा और ओपल माना जायेगा.

navaratna-1024x1015मुस्लिम भाग्य रत्न पद्धति द्वारा 15 – 10 – 1980 को जन्मे व्यक्ति का भाग्य रत्न हीरा और ओपल होंगे…