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नवरात्र यानि शक्ति उपासना

12140579_945663408834863_3178067581480433121_nसंधिकाल सदा ही अनिष्टकारक माने गए हैं. चाहे ऋतुओं के संधिकाल हों अथवा राजनीतिक सत्ता के.

ऋतुओं के संधिकाल व्यक्ति को बीमार कर देते हैं तो राजनीतिक सत्ता के संधिकाल रक्तपात और अराजकता का वातावरण निर्मित करते हैं.

ज्योतिष में भी दो राशियों या नक्षत्रो की संधि के मध्य स्थित ग्रह अथवा लग्न को बलहीन माना गया हैं. दो ऊर्जा बलों में फंसा ग्रह या भाव कमजोर हो जाता है.

ऐसे ही दिन और रात के संधिकालों में प्रभु सुमिरन और ध्यान का विधान है जिसे संध्या कहा जाता है. 
दिन और रात के संधिकालों का आधिपत्य केतु और राहु के पास है.

नवरात्र पर्व भी दो ऋतुओं के संधिकालों में संपन्न किये जाते हैं. एक ऋतु जा चुकी है और दूसरी अभी आयी नहीं है.

शरीर एक ऋतु की अभ्यस्तता से विपरीत ऋतु में जा रहा है. इस ऋतु परिवर्तन के कारण मौसमी बीमारियां होती हैं क्योंकि बदलाव के कारण हमारा शारीरिक प्रतिरक्षा तंत्र कमजोर हो जाता है.

प्राचीन भारतीय मनीषियों ने नवरात्र रूप में मनुष्यों को इस बदलती स्थिति से निपटने के लिए कुछ आचार और नियम दिये हैं.

शरीर अनुकूलता से प्रतिकूलता की तरफ जा रहा है. ऐसे में शक्ति का सर्वाधिक क्षरण होता है. खानपान का ध्यान रखते हुए विशेष नियम और जीवनशैली का पालन कर व्यक्ति इस बदलाव की स्थिति से भलीभांति निपट सकता है. 
भारत में मुख्य ऋतु परिवर्तन जो की वर्ष में दो बार आता है नवरात्र यानि शक्ति उपासना कहलाता है.

शक्ति उपासना और कुछ दिनों का संयमित जीवन व्यक्ति में नया जोश और उत्साह भर देते है. 
इन दिनों उपवास करने से शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता में अद्भुत वृद्धि होती है. शक्ति स्मरण और उपवास तन मन के समस्त संचित मैल को जला डालते हैं और व्यक्ति नई चुनौती के लिये सक्षम हो जाता है.

ऋतुओं के संधिकालों में शांत चित्तता, स्थिरता, शक्ति सुमिरन, उपवास और संतुलित भोजन आदर्श हैं.

इस वर्ष शारदीय नवरात्र 1 अक्टूबर शनिवार से आरम्भ हो रहे हैं.