Monthly Archives: August 2015

R और दुर्भाग्य

देवनागरी वर्णमाला में ‘र’ वर्ण सर्वाधिक दुर्भाग्यशाली वर्ण है.
ज्योतिष में ‘र’ नामाक्षर तुला राशि के अंतर्गत आता है जिसका स्वामी शुक्र है.
जिनका भी नाम ‘र’ से शुरू होता है मुसीबतें उनका पीछा ही नहीं छोड़ती. मानसिक संताप सदा बना रहता है.
सब कुछ होते हुए भी ये जीवन का आनंद नहीं उठा पाते. अल्पायु दर भी सर्वाधिक इसी नामाक्षर मे पाई जाती है.

वह कभी भी प्राप्त नहीं होता जिसकी कल्पना यह मन में संजोये रखते हैं… Letter-R-icon

नीलम का अधिपति कौन शनि या राहू

 1456753_789578677776671_1605912565933813622_nप्राचीनकाल से ही नीलम को शनि रत्न माना जाता रहा है.
लेकिन इस रत्न की तुरंत प्रतिक्रिया की प्रवृत्ति मन में संदेह उत्पन्न करती है की क्या यह वास्तव में शनि रत्न है.
क्योंकि तुरंत प्रतिक्रिया शनि का स्वभाव नहीं है. शनि एक मंदगामी ग्रह है. इसीलिये इसे शनैश्चर भी कहा गया है.
जबकि तुरंत और अचानक प्रतिक्रिया राहु का स्वाभाव है. राहु नीलवर्णी माना गया है. सभी प्रकार के विषों का अधिपत्य राहु कोप्राप्त है.
इधर ज्योतिष की अपेक्षाकृत नई विधा ‘लाल किताब’ भी नीलम को राहु की कारक वस्तु मानती है.
यह बात नीलम के स्वभाव से मेल खाती है.
प्राचीन मान्यता भी निराधार नहीं हो सकती तो फिर नीलम रत्न का अधिपति कौन है.
शनि या राहु.
राजा दशरथ द्वारा रचित शनि स्तोत्र में शनि को ‘नीलांजन समाभासं’ कहा गया है. नीलांजन नीला थोथा ( Copper Sulphate ) को कहा जाता है जिसका रंग हल्का नीला आसमानी जैसा होता है.
यहां ये जानना भी दिलचस्प होगा की त्वरित प्रक्रिया वाले मामले गहरे नीले रंग के नीलम से ही सम्बंधित होते हैं. हलके रंग के नीलम द्वारा तुरंत प्रतिक्रिया अनुभव में नहीं आती.
ऐसे में कहा सकता है की नीलम रत्न पर दो ग्रहों का आधिपत्य है. रत्न के रंग के अनुसार स्वामित्व बदल जाता है.
हलके आसमानी रंग का नीलम शनि की कारक वस्तु है और गहरे नीले रंग का राहु की.
व्यवहार में भी यही वर्गीकरण सम्यक फल देता अनुभव हुआ है…

 

 

राहू

राहू विजातीय rahu2तत्वों ( प्रकृति ) का प्रतिनिधित्व करता है. आधारहीन और भ्रामक मान्यता राहू का अधिकार क्षेत्र है. ऐसी विचारधारा जिसका कोई वैज्ञानिक अथवा आध्यात्मिक आधार ना हो राहू के अंतर्गत आती है.
राहू सदा उल्टी चाल चलता है. उल्टी लिपि पर राहू का अधिकार है. नकाबपोश व्यक्तियों का कारक भी राहू है. साथ ही बंजर , अनुपजाऊ और रेतीली भूमि का कारकत्व भी राहू के पास है. वर्जनाहीन कौटोम्बिक यौन सम्बन्ध राहू की विशेषता हैं. साथ ही जो सम्यक अथवा अनुभवजनित है उससे धुर उलट व्यवहार राहू का स्वभाव है.
इसी लिये एक मत विशेष का कारक राहू को माना जाता है.
राहू मात्र सर है धड़ गायब है. इसी लिए राहू प्रदत्त सुख सौभाग्य लैंगिक और आधारहीन ( सांसारिक ) होते हैं.

राहु अधिष्ठित भाव बताता है की अतीत में क्या कामना की गई थी. इस भाव के फल प्रचुरता से पूरे जीवन भर प्राप्त होते हैं.
राहु बिजली का कारक है. बिजली की लपक की तरह अकस्मात् घटनाओं को घटवा देना इसकी विशेषता है…

केतु और मोक्ष

केतु मोक्ष के कारक हैं का मतलब है की प्रकृति द्वारा प्रदत्त नवग्रह व्यवस्था में उनकी भूमिका जहां अटकाव है उसे व्यक्त करने की है.
केतु अधिष्ठित भाव और उसका कारक बताते हैं की मोक्ष प्राप्ति के मार्ग में क्या बाकी है जिसके प्रति अतृप्ति का भाव है. जब तक तमाम अतृप्तियां तृप्त नहीं कर ली जायेंगी तब तक पूर्ण विघटन घटित नहीं होगा.
केतु द्वारा कुंडली की कमजोर और अभावात्मक स्थिति इंगित होती है. अब व्यक्ति इस कमी को पूरा करने जी तोड़ कोशिश करेगा. इसे पा लेगा और पा लेने के बाद इसकी व्यर्थता को जान लेगा. जान लेने के बाद आगे बढ़ जाएगा.
इस प्रकार केतु शन: शन: व्यक्ति को समस्त सांसारिकता की उपलब्धि का यत्न ( बारी बारी से विभिन्न भावात्मक स्थितियां बनाते हुए ) उपलब्धि , भोग और उसकी व्यर्थता का बोध कराते हुए उसके संयोजन को विघटित करता चला जाएगा और एक दिन उसे कामना शून्य कर मोक्ष प्रदान कर देगा.
मंगल परमात्मा की संयोजन और केतु इस संयोजन के विघटन की प्रक्रिया के उपकरण हैं…
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फिरोजा

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फिरोजा रत्न को शुक्र और शनि का मिश्रित रत्न माना जाता है. ज्योतिष में शुक्र और शनि की युति लैला मजनू की जोड़ी के नाम से प्रसिद्द है. फिरोजा मनवांछित प्रेम प्राप्ति, नजरबट्टू, खुशनुमा मिजाज और भोगविलास के लिए पहना जाता है. इसे बड़े आकार में पहनने का रिवाज है. इसकी उंगली अनामिका और धातु चांदी है.

ओपल

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ओपल शुक्र ग्रह का रत्न है. सुखों में कमी , पति पत्नी में वैमनस्य, विपरीत लिंगियों के प्रति उदासीनता, संतानहीनता, क्रोध, धन की कमी आदि लक्षणों में इसे पहनना चाहिये. इसे धारण करने से शुक्र को बल मिलता है. इसे चांदी में अनामिका में धारण किया जाता है.

 

लहसुनिया

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लहसुनिया केतु रत्न है. मुख्य रूप से यह कनकखेत, श्यामखेत और धूम्रखेत तीन प्रकार का उपलब्द्ध होता है. कुंडली विवेचना से इनमे से किस किस्म को धारण किया जाये इसका पता चलता है. मानसिक भटकाव, लक्ष्यहीनता, जिजीविषा में कमी आदि स्थितियों में इसका उपयोग आदर्श है. कुंडली विवेचना उपरांत ही इसकी धातु और उंगली का निर्धारण किया जाता है.

पन्ना

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पन्ने का स्वामी बुध है. पन्ना कनिष्ठिका उंगली में स्वर्ण में पहना जाता है. पन्ना आजीविका की कमी, याद्दाश्त में कमी, दिमागी कमजोरी, व्यवहारिकता में कमी और बुध की शुभता बढ़ाने के लिये धारण किया जाता है.

पुखराज

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पुखराज रत्न के अधिपति बृहस्पति देव हैं. बृहस्पति की शुभता को बल देने के लिये पुखराज को तर्जिनी उंगली में स्वर्ण मे पहना जाता है. इसके धारण करने से परिपक्वता, विनम्रता और विवेक में वृद्धि होती होती है.

गोमेद

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गोमेद राहु रत्न है. राहु के उत्पात को शांत करने के लिये इसे मध्यमा में पंचधातु में पहनने का विधान है.