अलग वस्तुएं हैं कुमकुम और सिन्दूर

भारतीय पूजा उपासना और लोक व्यवहार में कुमकुम और सिन्दूर का बहुत महत्व है.

दोनों ही वस्तुओं को अत्यंत शुभ और पवित्र माना गया है. कई बार कुमकुम और सिन्दूर को एक समझने की भूल लोगों द्वारा कर ली जाती है लेकिन ऐसा नहीं है. ये दोनों बिलकुल अलग पदार्थ हैं और दोनों का उपयोग भी बिलकुल अलग है.

कुमकुम जिसे रोली भी कहा जाता है एक पूजा और सम्मान की वस्तु है जिसे मस्तक पर धारण किया जाता है. तिलक लगाने के लिए जो पदार्थ प्रयोग होता है वह कुमकुम है. स्वास्तिक एवं अन्य सौभाग्यवर्धक चिन्ह भी कुमकुम से ही उकेरे जाते हैं. वधु के गृहप्रवेश पर उसके पैरों और हाथों की छाप के लिए भी कुमकुम ही इस्तेमाल होता है. व्यापारी वर्ग द्वारा नववर्ष आरम्भ पर अपने बही खातों पर कुमकुम से शुभ चिन्ह अंकित कर इसके छींटे दिए जाते हैं जिसे सुख समृद्धि का प्रतीक माना जाता है.
कुमकुम हल्दी से बनने वाला पदार्थ है. हल्दी और चूने के पानी के संयोग से रासायनिक प्रक्रिया होती है और उसका रंग बदल कर लाल हो जाता है. यही कुमकुम है.

जबकि सिन्दूर एक श्रृंगारिक पदार्थ है जिसका उपयोग सुहागिन स्त्रियों द्वारा श्रृंगार के तौर पर किया जाता है. पूजा उपासना में भी हनुमान और भैरव का श्रृंगार सिन्दूर द्वारा करने की परंपरा है जिसे चोला चढ़ाना कहते हैं.
सिन्दूर का रसायनिक नाम मरक्यूरिक सल्फाइड है. मरक्यूरिक सल्फाइड प्राकृतिक खनिज रूप में पृथ्वी पर पाया जाता है. हिंदी में इसे सिंगरिफ और अंग्रेजी में Cinnabar कहते हैं. इसी सिंगरिफ का पिसा हुआ रूप सिन्दूर या Vermillion कहलाता है.