त्यौहार ना मनाने का ज्योतिषीय कारण

ज्योतिष अनेक प्रकार के पूर्व ऋणों की चर्चा करता है और इनमें से एक है स्व: ऋण.
कुंडली के पंचम भाव में यदि शुक्र, शनि, राहु और केतु में से कोई अकेले विराजमान हो तो स्व: ऋण होता है.
इस ऋण के कारण जातक त्यौहार और खुशियां मनाने से परहेज करता है. उसे अपने परंपरागत रीति रिवाज मानने में भी पीड़ा होती है.

अपनी परम्पराओं का निरादर कर वह विजातीय धर्मों और रीतिरिवाजों में रूचि और सहानुभूति रखता है.
त्यौहार ना मनाने के लिए वह अनेक तर्क देता है और दूसरों को भी ऐसा ही करने के लिए प्रेरित करता है.
अपनी अंतरात्मा को कुचलना इस ऋण का कारण माना गया है.
जो लोग अपने विवेक और अंतरात्मा को लगातार मारते रहते हैं वे इस ऋण के शिकार हो जाते हैं.

शरद पूर्णिमा

अश्विन मास की पूर्णिमा शरद पूर्णिमा के नाम से जानी जाती है.
ज्योतिष अनुसार शरद पूर्णिमा के चंद्र को सौलह कला संपूर्ण माना जाता है. इस रात्रि चंद्र अपने पूर्ण वैभव के साथ दिखाई देता है.

शरद पूर्णिमा का संबंध माता लक्ष्मी से है. इस दिन माता लक्ष्मी की पूजा का विशेष विधान है.
जैसा की सभी जानते हैं चंद्र मन का कारक है. श्री सूक्त में कहा गया है ‘चंद्रा हिरणमयी लक्ष्मी’. इस दिन रात में खीर बनाकर तीन घंटे तक मिटटी या चांदी के पात्र में खुले आकाश नीचे रखने की परंपरा है. इस दिन चंद्रमा की किरणों से अमृत बरसता है. तत्पश्चात इस खीर को खाने का विधान है. मान्यता है की इससे श्वास और मन संबंधी रोग नष्ट हो जाते हैं.

शरद पूर्णिमा को ही भगवान् श्री कृष्ण ने सर्वप्रथम महारास रचा कर कामदेव का मानमर्दन किया था. इसलिए यह महारास पूर्णिमा भी कही जाती है.

इसे कोजागरी पूर्णिमा भी कहते हैं जो की संस्कृत शब्द कोजागृत का अपभ्रंश है. इसका अर्थ है कौन जागा है ?
इस रात्रि जागरण की बड़ी महिमा है. चंद्र को निहारते हुए उसकी किरणों द्वारा पोषित खीर का नैवेद्य माता लक्ष्मी को अर्पित कर और प्रसाद रूप स्वयं ग्रहण कर भौतिक और मानसिक समृद्धि प्राप्त होती है …

 

 

हिन्दुओं में प्रचलित धारणाएं जो हिंदुत्व हैं ही नहीं

1. भगवान से डरना – सनातन में भगवान से डरने जैसी कोई बात है ही नहीं. सनातन अवधारणा कण कण में ईश्वर का अस्तित्व मानती है और विश्वास करती है की ऐसा कुछ भी नहीं जिसमे ईश्वर ना हो. ऐसे में ईश्वर से डरना बेमानी है क्योंकि ईश्वर कोई अलग अस्तित्व नहीं है बल्कि जो कुछ भी है वह ईश्वर है. श्रीकृष्ण ने इस बात को गीता में बहुत अच्छी तरह परिभाषित किया है. ईश्वर से डरना ईसाई और इस्लामिक धारणाएं हैं. ईसाईयत में तो मनुष्य को जन्मजात पापी माना गया है.

2. किसी की मृत्यु पर शोक सन्देश में RIP (Rest In Peace) लिखना भी हिन्दू मान्यता नहीं है. यह ईसाई, इस्लाम और यहूदी जैसे एक ही जन्म को मानने वाले धर्मों की मान्यता है. इन धर्मों में माना जाता है की मनुष्य का केवल एक ही जन्म होता है और मृत्यु के बाद कयामत के दिन तक व्यक्ति को कब्र में अपने फैसले के लिए इन्तजार करना पड़ता है. जबकि सनातन पुनर्जन्म में विश्वास रखता है और मृत्यु उपरान्त जीव की प्रेत, स्वर्ग, नर्क, पुनर्जन्म अथवा मोक्ष स्थिति की चर्चा करता है. किसी की मृत्यु उपरान्त दिवंगत आत्मा को श्रद्धांजलि दी जाती है और उसकी सद्गति (मोक्ष) की कामना की जाती है.

3. हिंदुत्व में जो कुछ भी पौराणिक है वह इतिहास है. इस मान्यता में मिथक जैसा कुछ नहीं होता. राम, कृष्ण, देवी देवता, ऋषि मुनि, राक्षस, दानव सब इतिहास हैं ना की काल्पनिक मिथक. जबकि पश्चिमी देवी देवता मिथक कहलाते हैं और क्योंकि उनमें कल्पना का समावेश होता है.

4. हिंदुत्व में मूर्ति पूजा किसी प्रतिमा या छवि की पूजा नहीं है ना ही यह प्रतीकों की पूजा है. देव प्रतिमा को विग्रह कहा गया है. विग्रह का अर्थ होता है फैलाना, यह उस देवी देवता का विस्तार है जिसे हम पूजना चाहते हैं. देवी देवता के उस विस्तार को जिसे हम देख पाते हैं विग्रह कहलाता है.

5. श्री हनुमान और श्री गणेश जैसे देवताओं को अंग्रेजी अनुवाद में मंकी गॉड और एलिफैंट गॉड कहना बहुत गलत बात है. यह अनुवाद इन श्रद्धा चरित्रों से न्याय नहीं करता इससे बचना चाहिए. इसकी जगह इनके श्री युक्त नाम ही प्रयोग करने चाहिए.

6. हिन्दुओं के मंदिर प्रार्थना भवन या prayer Hall नहीं हैं. वहां पूजा की जाती है और आशीष मांगे जाते हैं. प्रार्थना करना सनातन शैली नहीं है इसके बदले हिन्दू भगवान से आशीष मांगता है. बड़े बुजुर्ग और गुरुजन भी छोटों को आशीष ही देते हैं. हिन्दू अपने मंदिर से कभी खाली हाथ भी नहीं आता मंदिर छोटा हो या बड़ा वह भगवान का चरणामृत और प्रसाद जरूर पाता है.

7. हिन्दुओं में त्यौहार और उत्सव दीप जलाकर मनाये जाते हैं मोमबत्ती बुझा कर नहीं. सनातन ने अग्नि को भी देवता माना है और उसे फूंक मारकर बुझाना अशिष्टता है. तमसो मा ज्योतिर्गमय का उद्घोष हिंदुत्व की विशेषता है.

8. हिंदुत्व धार्मिकता और भौतिकता की बात भी नहीं करता क्योंकि वह सभी कुछ दिव्य मानता है. अंग्रेजी के Religion, Religious और Materialistic जैसे शब्दों का हिंदुत्व में कोई स्थान नहीं है. धर्म हिंदुत्व में व्यक्तिगत बात है और धार्मिकता जैसा कुछ नहीं होता. धर्म को सनातन में कर्तव्य भी कहा गया है. आज जिसे धर्म कहा जाता है सनातन उसे सम्प्रदाय कहता है. सनातन ऋषि मुनियों ने आत्मा के सन्दर्भ में अध्यात्म का जिक्र किया है जिसका अर्थ होता है स्वयं का अध्ययन.

9. अंग्रेजी शब्द Sin जिसका अर्थ पाप किया जाता है वह भी सनातन द्वारा वर्णित पाप शब्द का सही अर्थ स्पष्ट नहीं करता. सनातन में पूरा जोर धर्म के संपादन पर है. धर्म का अर्थ है देश, काल और परिस्थिति अनुसार सम्पादित किया गया सम्यक कर्म इसे कर्तव्य भी कहा गया है. जो भी धर्म नहीं है वह अधर्म है और अधर्म पाप का जनक है. इसके अलावा ग्लानि को भी पाप का परिणाम माना गया है.

10. सनातन के योग का अर्थ शारीरिक व्यायाम नहीं है जैसा की अंग्रेजी अर्थ Yoga में समझा जाता है. योग का अर्थ है मन का आत्मा से जुड़ाव. योग के प्रणेता ऋषि पतंजलि का सूत्र है ‘योगश्च चित्तवृत्ति निरोध: यानि योग चित्त की वृत्तियों को रोकता है. चित्तवृत्ति मन के कार्यव्यापार को कहते हैं. योग इस कार्यव्यवहार के ठहराव में सहायक है. ऐसे ही ध्यान का अंग्रेजी अनुवाद Meditation भी गलत है क्योंकि Meditation का अर्थ है आराम पाना. यह अंग्रेजी शब्द Medicine से निकला है जबकि ध्यान का अर्थ है कुछ ना होना, ध्यान कुछ करना नहीं बल्कि होना है मात्र होना. यह भाव और मन के पार की स्थिति है. इसे मात्र आराम देने वाला मानना हास्यास्पद है.

स्त्रियों के लिए सौभाग्यशाली है हीरे की लौंग

नाड़ी ज्योतिष में बृहस्पति नाक का कारक है. साथ ही बृहस्पति वृद्धि, सौभाग्य और शुभता का कारक भी है. नाड़ी में स्त्रियों का जीवकारक शुक्र को माना गया है. हीरा शुक्र का रत्न है. जब स्त्रियां हीरे की लौंग को नाक में धारण करती हैं तो माना जाता है की जीव शुक्र का सम्बन्ध बृहस्पति यानि वृद्धि, सौभाग्य और शुभता से बन जाता है.

इसीलिए भारत में परंपरा है की स्त्रियां नाक में सच्चे हीरे की लौंग धारण करें जिससे उनके जीवन में सुख, सौभाग्य और समृद्धि का समावेश रहे.

अलग वस्तुएं हैं कुमकुम और सिन्दूर

भारतीय पूजा उपासना और लोक व्यवहार में कुमकुम और सिन्दूर का बहुत महत्व है.

दोनों ही वस्तुओं को अत्यंत शुभ और पवित्र माना गया है. कई बार कुमकुम और सिन्दूर को एक समझने की भूल लोगों द्वारा कर ली जाती है लेकिन ऐसा नहीं है. ये दोनों बिलकुल अलग पदार्थ हैं और दोनों का उपयोग भी बिलकुल अलग है.

कुमकुम जिसे रोली भी कहा जाता है एक पूजा और सम्मान की वस्तु है जिसे मस्तक पर धारण किया जाता है. तिलक लगाने के लिए जो पदार्थ प्रयोग होता है वह कुमकुम है. स्वास्तिक एवं अन्य सौभाग्यवर्धक चिन्ह भी कुमकुम से ही उकेरे जाते हैं. वधु के गृहप्रवेश पर उसके पैरों और हाथों की छाप के लिए भी कुमकुम ही इस्तेमाल होता है. व्यापारी वर्ग द्वारा नववर्ष आरम्भ पर अपने बही खातों पर कुमकुम से शुभ चिन्ह अंकित कर इसके छींटे दिए जाते हैं जिसे सुख समृद्धि का प्रतीक माना जाता है.
कुमकुम हल्दी से बनने वाला पदार्थ है. हल्दी और चूने के पानी के संयोग से रासायनिक प्रक्रिया होती है और उसका रंग बदल कर लाल हो जाता है. यही कुमकुम है.

जबकि सिन्दूर एक श्रृंगारिक पदार्थ है जिसका उपयोग सुहागिन स्त्रियों द्वारा श्रृंगार के तौर पर किया जाता है. पूजा उपासना में भी हनुमान और भैरव का श्रृंगार सिन्दूर द्वारा करने की परंपरा है जिसे चोला चढ़ाना कहते हैं.
सिन्दूर का रसायनिक नाम मरक्यूरिक सल्फाइड है. मरक्यूरिक सल्फाइड प्राकृतिक खनिज रूप में पृथ्वी पर पाया जाता है. हिंदी में इसे सिंगरिफ और अंग्रेजी में Cinnabar कहते हैं. इसी सिंगरिफ का पिसा हुआ रूप सिन्दूर या Vermillion कहलाता है.

बेहतर आजीविका के लिए दान उपाय

आजीविका की चुनौतियों से निबटने के लिए दशमेश की कुंडली में स्थिति और उस स्थिति के अनुरूप दान एक बहुत ही कारगर उपाय है. इस विशेष दान उपाय को करने से दशमेश अत्याधिक बल पाता है और आजीविका पर छाये संकट के बादल छंट जाते हैं.
हिन्दू मान्यता अनुसार सतयुग में ब्रह्म का निवास शब्द में, त्रेता में आकाश में, द्वापर में जल में और कलयुग में अन्न में माना गया है. कलयुग में अन्न दान सबसे बड़ा दान है. इसीलिए इस उपाय के लिए अन्न दान को प्राथमिकता देना आदर्श है.

दशमेश की विभिन्न भाव स्थिति अनुसार दान पदार्थ निम्न प्रकार से हैं –

1. दशमेश प्रथम भाव में – दान पदार्थ : आटे के लडडू, आटे का हलवा, मीठी रोटी, गुड़ रोटी
2. दशमेश द्वितीय भाव में – दान पदार्थ : कढ़ी चावल
3. दशमेश तृतीय भाव में – दान पदार्थ : मूंग दाल हलवा, मूंग दाल बर्फी
4. दशमेश चतुर्थ भाव में – दान पदार्थ : दूध और दूध से बनी सफेद मिठाईयां, खीर
5. दशमेश पंचम भाव में – दान पदार्थ : आटे के देसी घी के लडडू और हलवा, देसी घी पिन्नी,देसी घी पंजीरी
6. दशमेश षष्टम भाव में – दान पदार्थ : मूंग दाल हलवा, मूंग दाल बर्फी
7. दशमेश सप्तम भाव में – दान पदार्थ : दही, लस्सी, छाछ, खट्मिट्ठे रसदार फल
8. दशमेश अष्टम भाव में – दान पदार्थ : तिल की मिठाईयां, काले रंग की मिठाईयां
9. दशमेश नवम भाव में – दान पदार्थ : बेसन से बनी देसी घी की मिठाईयां
10. दशमेश दशम भाव में – दान पदार्थ : मूंग और उड़द दाल पापड़
11. दशमेश एकादश भाव में – दान पदार्थ : चना उड़द मिक्स दाल, चना उड़द पापड़
12. दशमेश द्वादश भाव में – दान पदार्थ : चना उड़द मिक्स दाल, चना उड़द पापड़

योग जो कभी निष्फल नहीं होते

ज्योतिष में कुछ ऐसे समीकरण और स्थितियां हैं जिन्हें अद्भुत रूप से सदा अपना फल देते पाया गया है.

ऐसे समीकरणों में से कुछ निम्न प्रकार हैं –

मकर राशि का जातक जीवन में कम से कम एक बार भयंकर पतन जरूर झेलता है.

चतुर्थ मंगल जीवन को स्थिर नहीं होने देता. जातक सदा खुद को त्रिशंकु और खोखला सा महसूस करता है.

मकर राशि में तीन से अधिक ग्रहों की युति व्यक्ति को जीवन में पराजित और कलंकित करती है.

बृहस्पति चंद्र का परस्पर दशांतर नुक्सान और भय का फलित करता है.

मंगल शुक्र की 6 डिग्री तक की युति अवैध यौन संबंधों की गारंटी है.

मेष लग्न में धैर्य की भारी कमी होती है, इन्तजार इसके बस की बात नहीं.

लग्नस्थ शनि जीवन को संघर्षमय बना देता है. आजीविका की चुनौतियां पिंड ही नहीं छोड़तीं.

सप्तम बुध वाला जातक पारस पत्थर हो जाता है. दूसरों को तो सोना कर देता है पर खुद पत्थर ही रह जाता है.

चंद्र के साथ जब राहु शनि या शनि मंगल युति करते हैं तो चिंताएं और तनाव जीवन भर पीछा ही नहीं छोड़ते.

बृहस्पति शुक्र युति अप्राकृतिक और अस्वीकृत यौन रूचि का परिचायक हैं.

किसने निकाला था भारत की आजादी का मुहूर्त

देश के नियंताओं ने देश की आजादी के लिये 15 अगस्त 1947 की शुरुआत यानी अर्धरात्रि को चुना.
क्योंकि इसके पीछे उनकी ज्योतिष के प्रति गहन आस्था थी.
उज्जैन के तत्कालीन महान ज्योतिषी पद्म भूषण पंडित सूर्यनारायण व्यास ने इस मुहूर्त को चुना था.
भारत के प्रथम राष्ट्रपति डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद व्यास जी के बड़े भक्त थे. अंग्रेजों ने भारत और पाकिस्तान की स्वतंत्रता के लिए 14 और 15 अगस्त की दो तारीखें तय की थीं. इन्हीं तारीखों में से दोनों ने अपना समय चुनना था.
दिलचस्प बात ये है की व्यास जी ने 1938 में ही अपने एक ज्योतिषीय लेख में भारत की स्वतंत्रता तिथी 15 अगस्त 1947 घोषित कर दी थी.
उनके अनुसार यह मुहूर्त स्थिर लग्न में था जिसके कारण भारत का लोकतंत्र सदा स्थिर रहेगा और आने वाले वर्षों में यह राष्ट्र विश्व का सिरमौर बनेगा.

व्यास जी ने गांधी वध भी 1924 में ही घोषित कर दिया था. उन्होंने एक लेख में लिखा था गांधी की स्वाभाविक मृत्यु नही होगी वे मारे जायेंगे उनकी हत्या एक ब्राह्मण करेगा.
ऐसे ही नेहरू का भी तमाम भविष्य व्यास जी ने खोलकर रख दिया था और वे कितने साल राज करेंगे यह भी आजादी से पहले ही बता दिया था तब नेहरू का कद बहुत छोटा था और लोगों को एकाएक इस बात पर विशवास नहीं हुआ था.
नेहरू भी व्यास जी से परामर्श लिया करता था लेकिन इस बात को छिपाया जाता था क्योंकि नेहरू ने अपनी छवि एक सेक्युलर की बना रखी थी.

लाल बहादुर शास्त्री द्वारा अमावस्या के दिन प्रधानमन्त्री पद की शपथ लेने को भी व्यास जी ने बहुत गलत बताया था.
शास्त्री जी भी व्यास जी को बहुत मानते थे पर उन्होंने बात हंसी में उड़ा दी. शास्त्री जी जब ताशकंद जाने लगे तब पंडित सूर्यनारायण व्यास जी ने ‘हिंदी हिंदुस्तान’ में एक लेख लिखा की शास्त्री जी ताशकंद से जीवित नहीं लौटेंगे. संपादक ने यह लेख छपने से रोक लिया और शास्त्री जी तक यह अनहोनी पहुंचाई.
शास्त्री जी बात को टाल गए. ताशकंद में शास्त्री जी की मृत्यु के बाद अखबार ने इस टिप्पणी के साथ लेख छापा की यह लेख उन्हें शास्त्री जी की मृत्यु से पहले ही मिल चुका था.

मोरारजी देसाई के बारे में प्रचारित था की वह ज्योतिष पर बिलकुल विशवास नहीं करते लेकिन उन्होंने भी बंबई राज्य की स्थापना का मुहूर्त व्यास जी से निकलवाया था.
पंडित सूर्यनारायण व्यास जी से इंदिरा गांधी ने भी ज्योतिषीय परामर्श लिया था. व्यास जी ने इंदिरा गांधी और उनके दोनों पुत्रों की अप्राकृतिक मृत्यु के विषय में भी बता दिया था लेकिन इस बात को दफन कर दिया गया.

1936 में ब्रिटिश सम्राट एडवर्ड अष्टम की भारत यात्रा अफवाहों पर भी व्यास जी ने स्पष्ट भविष्यवाणी कर दी थी की वे भारत नहीं आएंगे और उनकी गद्दी के दिन अब गिने चुने हैं.
ऐसा ही हुआ सम्राट भारत नहीं आये और कुछ ही दिन बाद एक अमेरिकन महिला लेडी सिम्पसन से विवाह करने से उठे विवाद में सम्राट को सिंहासन छोड़ना पड़ा. इतना ही नहीं हिटलर भी व्यास जी का भक्त था और उनसे ज्योतिषीय परामर्श लेता था…

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गुरु नानक जयंती

गुरु नानक देव जी का जन्म कार्तिक पूर्णिमा को पाकिस्तान के तलवंडी नामक स्थान पर हुआ था. आज यह स्थान उनके सम्मान में ननकाना साहिब कहलाता है. गुरु नानक सिक्खों के आदि गुरु हैं.
गुरु नानक का व्यक्तित्व असाधारण था. उनमें पैगम्बर, दार्शनिक, राजयोगी, गृहस्थ, त्यागी, धर्मसुधारक, समाज-सुधारक, कवि, संगीतज्ञ, देशभक्त, विश्वबन्धु सभी के गुण उत्कृष्ट मात्रा में विद्यमान थे. उनमें विचार शक्ति और क्रिया शक्ति का अपूर्व सामंजस्य था. उन्होंने पूरे देश की यात्रा के साथ ही विदेशी यात्राएं भी कीं और लोगों पर उनके विचारों का असाधारण प्रभाव पड़ा. उनमें सभी गुण मौजूद थे. पैगंबर, दार्शनिक, राजयोगी, गृहस्थ, त्यागी, धर्मसुधारक, कवि, संगीतज्ञ, देशभक्त, विश्वबंधु आदि सभी गुण जैसे एक व्यक्ति में सिमटकर आ गए थे. उनकी रचना ‘जपुजी’ का सिक्खों के लिए वही महत्व है जो हिंदुओं के लिए गीता का है.
गुरुनानक देव जी ने अपने अनु‍यायियों को दस अतिमहत्वपूर्ण शिक्षाएं दीं –

1. ईश्वर एक है.
2. सदैव एक ही ईश्वर की उपासना करो.
3. ईश्वर सब जगह और सभी प्राणी मात्र में मौजूद है.
4. ईश्वर की भक्ति करने वालों को किसी का भय नहीं रहता.
5. ईमानदारी से और मेहनत कर के उदरपूर्ति करनी चाहिए.
6. बुरा कार्य करने के बारे में न सोचें और न किसी को सताएं.
7. सदैव प्रसन्न रहना चाहिए. ईश्वर से सदा अपने लिए क्षमा मांगनी चाहिए.
8. मेहनत और ईमानदारी की कमाई में से ज़रूरतमंद को भी कुछ देना चाहिए.
9. सभी स्त्री और पुरुष बराबर हैं.
10. भोजन शरीर को ज़िंदा रखने के लिए ज़रूरी है पर लोभ लालच व संग्रहवृत्ति बुरी है.

इस वर्ष यह पर्व 14 नवंबर को है.guru-nanak-jayanti2

दीवाली 2016

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दीवाली शरद ऋतु में मनाया जाने वाला प्राचीन हिंदू त्यौहार है. यह त्यौहार अंधकार पर प्रकाश की विजय को दर्शाता है.
भारतवर्ष में मनाए जाने वाले सभी त्यौहारों में दीवाली प्रमुख त्यौहार है. इसे सिख तथा जैन भी मनाते हैं. जैन धर्म के लोग इसे भगवान महावीर के मोक्ष दिवस के रूप में मनाते हैं तथा सिख समुदाय इसे बंदी छोड़ दिवस के रूप में मनाता है.

माना जाता है दीवाली के दिन अयोध्या के राजा श्री रामचंद्र अपने चौदह वर्ष के वनवास के पश्चात वापिस लौटे थे. अयोध्यावासियों का ह्रदय अपने परम प्रिय राजा के आगमन से उल्लसित था. श्रीराम के स्वागत में अयोध्यावासियों ने घी के दीए जलाए. कार्तिक मास की सघन काली अमावस्या की वह रात्रि दीयों की रोशनी से जगमगा उठी थी. तब से आज तक भारतीय प्रति वर्ष यह प्रकाश पर्व बड़े हर्ष व उल्लास से मनाते हैं. यह पर्व अधिकतर ग्रिगेरियन कैलन्डर के अनुसार अक्टूबर या नवंबर महीने में पड़ता है. दीवाली दीपों का त्यौहार है और यह असत्य पर सत्य की विजय को दर्शाता है. दीवाली स्वच्छता व प्रकाश का पर्व है कई सप्ताह पूर्व ही दीवाली की तैयारियां आरंभ हो जाती हैं. लोग अपने घरों, दुकानों आदि की सफाई का कार्य आरंभ कर देते हैं. लोग घरों, दुकानों और प्रतिष्ठानों को साफ़ सुथरा कर सजाते हैं और अपने दोस्तों, सम्बन्धियों को नाना प्रकार के उपहार, मेवे और मिठाईयां बांटते हैं. खूब आतिशबाजी होती है.

इस वर्ष यह त्यौहार 30 अक्टूबर को मनाया जा रहा है.